गढ़चिरौली के बिनागुंडा में 40 साल बाद 'माओवाद मुक्त दिवाली', गोलियों की जगह गूंजे पटाखे
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के बिनागुंडा में 8 नवंबर 2026 को पहली बार 'माओवाद मुक्त दिवाली' मनाई गई — वह इलाका जहाँ करीब 40 वर्षों तक माओवादी हिंसा की छाया में पटाखों की नहीं, बल्कि गोलियों की आवाज़ें गूंजती थीं। इस ऐतिहासिक अवसर पर गढ़चिरौली पुलिस अधीक्षक एम. रमेश ने स्थानीय नागरिकों और सुरक्षाबलों के जवानों के साथ मिलकर त्योहार मनाया।
माओवाद मुक्त गढ़चिरौली की राह
पुलिस अधीक्षक एम. रमेश के अनुसार, जनवरी 2026 में बिनागुंडा में अग्रिम परिचालन अड्डे (AOP) की स्थापना के बाद ऑपरेशन 'अंतिम प्रहार' के ज़रिए जिले को माओवाद से मुक्त कराने में सफलता मिली। उन्होंने कहा, 'पहले इस जंगल में नक्सल के डर का अंधेरा था, गोलियों की आवाज़ आती थी। आज 40 साल के संघर्ष के बाद यहाँ दिवाली के पटाखों की आवाज़ है। हम घर-घर जाकर दीया जलाकर लोगों के मन में प्रकाश और विश्वास जगा रहे हैं।'
रमेश ने इस उपलब्धि का श्रेय सी-60 कमांडो, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF), राज्य रिज़र्व पुलिस बल (SRPF) और जिला पुलिस के जवानों के त्याग को दिया।
मुख्य घटनाक्रम: जिले भर में उत्सव
गढ़चिरौली पुलिस की ओर से जिले के सभी 70 पुलिस थानों, उपथानों और पुलिस सहायता केंद्रों में स्थानीय नागरिकों के साथ दिवाली का आयोजन किया गया। इस दौरान लोगों को मिठाइयाँ और पटाखे वितरित किए गए।
पुलिस अधीक्षक एम. रमेश स्वयं दुर्गम क्षेत्र में स्थित बिनागुंडा पुलिस सहायता केंद्र पहुँचे। अपर पुलिस अधीक्षक (अभियान) कार्तिक मधिरा ने गर्देवाड़ा, अपर पुलिस अधीक्षक (प्रशासन) गोकुल राज ने पेंढरी और अपर पुलिस अधीक्षक अहेरी हर्षवर्धन बी.जे. ने जिमलगट्टा में नागरिकों के साथ उत्सव में भागीदारी की।
आत्मसमर्पित माओवादियों के साथ जश्न
इस उत्सव का एक विशेष पहलू यह रहा कि माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर चुके लोगों को भी उत्सव में शामिल किया गया। गढ़चिरौली स्थित नवजीवन वसाहत में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में आत्मसमर्पित माओवादी सदस्यों के साथ दिवाली मनाई गई और पारंपरिक पकवानों का आनंद लिया गया। यह पहल पुनर्वास और सामाजिक पुनर्एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
आम जनता पर असर: किसानों को भी मिली मदद
दिवाली के अवसर पर जिले के दुर्गम और सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों के लिए विशेष सामाजिक पहल की गई। गढ़चिरौली पुलिस, पुलिस दादालोरा खिड़की, प्रोजेक्ट कृषि समृद्धि, सेवा मित्र मंडल और आदर्श मित्र मंडल पुणे के संयुक्त प्रयास से किसानों को अनाज, खाद्य सामग्री और दिवाली के पारंपरिक पकवान वितरित किए गए।
यह ऐसे समय में आया है जब गढ़चिरौली लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ माना जाता था। गौरतलब है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक पुनरुद्धार की ज़रूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
आगे की राह: विश्वास और विकास
पुलिस अधीक्षक एम. रमेश ने स्पष्ट किया कि माओवाद मुक्त गढ़चिरौली बनाने की दिशा में केवल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, जनभागीदारी, आपसी विश्वास और विकास की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे जनहितकारी कार्यक्रम आगे भी जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई गई है। बिनागुंडा की यह दिवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि दशकों के भय से मुक्ति का प्रतीक बन गई है — और अब असली परीक्षा होगी कि क्या यह शांति स्थायी विकास में बदल पाती है।