बाबरी विध्वंस पर यूसुफ अब्बास: 'सिर्फ सोनिया नहीं, पूरा देश रोया, संविधान का काला दिन था'
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव और प्रवक्ता मौलाना यूसुफ अब्बास ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर सोनिया गांधी की हालिया टिप्पणी के संदर्भ में कहा है कि 6 दिसंबर 1992 का दिन केवल सोनिया गांधी के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए रुलाने वाला था। उन्होंने इस दिन को भारत के संविधान के लिए काला दिन करार दिया। उनकी इस प्रतिक्रिया ने देशभर में राजनीतिक बहस को और तेज़ कर दिया है।
मौलाना यूसुफ अब्बास का बयान
मौलाना यूसुफ अब्बास ने कहा, 'जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया, तो सिर्फ सोनिया गांधी ही नहीं, बल्कि पूरा देश रो रहा था। बस कुछ ही लोग हंस रहे थे।' उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि मुद्दा किसी इमारत के टूटने या बनने का नहीं, बल्कि संविधान में दिए गए अधिकारों के हनन का है।
उन्होंने आगे कहा, 'मंदिर और मस्जिद के नाम पर पहले ही बहुत राजनीति हो चुकी है। अब सभी राजनीतिक दलों को गरीबी, बेरोज़गारी और शिक्षा की कमी जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब बाबरी विध्वंस की वर्षगाँठ के निकट आते ही राजनीतिक बयानबाज़ी फिर से तेज़ हो जाती है।
भाजपा का पलटवार
पटना में भाजपा प्रवक्ता अजय आलोक ने सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि अलग-अलग मुद्दों पर उनकी भावनाएँ अलग-अलग रहती हैं। उन्होंने आपातकाल और बाबरी विध्वंस को एक साथ उठाते हुए कहा, 'बाबरी मस्जिद के विध्वंस के समय उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन जब अफगानिस्तान में एक चर्च को तोड़ा जा रहा था, तब आँसू नहीं निकले।'
मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'जो कोई बाबरी मस्जिद के लिए आँसू बहाता है, वह कभी भगवान राम का भक्त नहीं हो सकता। जब राम भक्तों पर गोलियाँ चलाई गईं, तो उनकी आँखों में आँसू नहीं थे।'
एआईएमआईएम की राय: कांग्रेस भी दोषी
मुंबई में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि 6 दिसंबर 1992 भारत के लोकतंत्र के लिए एक अत्यंत काला दिन था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया, 'बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के लिए भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) जितने जिम्मेदार हैं, कांग्रेस भी उससे पीछे नहीं है।'
वारिस पठान ने अखिलेश यादव के प्रस्तावित अयोध्या दौरे और चुनावी बयानों को 'राजनीतिक स्टंट' बताते हुए कहा कि 'ईद दीपावली जैसी है, दीपावली ईद जैसी है' जैसे बयान एक खास समुदाय को लुभाने की कोशिश मात्र हैं। उन्होंने कहा कि अब पूरा समुदाय समझदार हो चुका है और उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में इसका जवाब मिलेगा।
आम जनता पर असर और व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर बहस हर बार चुनावी मौसम और वर्षगाँठ के करीब नई ऊँचाई पर पहुँच जाती है। आलोचकों का कहना है कि यह मुद्दा बार-बार उठाए जाने से गरीबी, बेरोज़गारी और शिक्षा जैसे असली सवाल हाशिए पर चले जाते हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है और तमाम दल अपनी-अपनी स्थिति मज़बूत करने में जुटे हैं। मौलाना यूसुफ अब्बास की अपील — कि राजनीतिक दल मंदिर-मस्जिद की जगह विकास के मुद्दों पर ध्यान दें — इस पृष्ठभूमि में और भी प्रासंगिक हो जाती है।