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मैडम भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को स्टटगार्ट में पहली बार विदेशी धरती पर फहराया था भारतीय ध्वज

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मैडम भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को स्टटगार्ट में पहली बार विदेशी धरती पर फहराया था भारतीय ध्वज

सारांश

1907 में जर्मनी की सरज़मीन पर मैडम भीकाजी कामा ने वह कर दिखाया जो तब किसी ने नहीं किया था — ब्रिटिश झंडा हटाकर भरी सभा में भारतीय ध्वज फहराया। तीन दशकों के निर्वासन में भी उनकी देशभक्ति की लौ कभी नहीं बुझी। उनकी जयंती 24 सितंबर को मनाई जाती है।

मुख्य बातें

मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को मुंबई के एक पारसी परिवार में हुआ था।
22 अगस्त 1907 को स्टटगार्ट की अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में उन्होंने ब्रिटिश झंडा हटाकर पहली बार विदेशी धरती पर भारतीय ध्वज फहराया।
1896 की प्लेग महामारी में उन्होंने पीड़ितों की अथक सेवा की और स्वयं भी बीमार पड़ीं।
लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा और दादाभाई नौरोजी से प्रेरित होकर उन्होंने 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' (1905) की स्थापना में भूमिका निभाई।
स्टटगार्ट का वह ध्वज बाद में पुणे की मराठा और केसरी लाइब्रेरी में संरक्षित किया गया।
13 अगस्त 1936 को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ; 26 जनवरी 1962 को उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया।

मैडम भीकाजी रुस्तम कामा ने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस के मंच पर ब्रिटिश झंडे को हटाकर पहली बार विदेशी भूमि पर भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज फहराया था। यह साहसिक कदम भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में एक अविस्मरणीय क्षण के रूप में दर्ज है। 24 सितंबर 1861 को मुंबई में जन्मी यह वीरांगना अपनी निर्भीकता और देशभक्ति के लिए आज भी श्रद्धा से याद की जाती हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

भीकाजी रुस्तम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को मुंबई के एक समृद्ध पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वराज जी पटेल मुंबई के जाने-माने व्यापारी थे। बचपन से ही तीव्र बुद्धि और भाषाओं में रुचि रखने वाली भीकाजी के मन में दूसरों की सहायता करने की भावना स्वाभाविक रूप से थी।

गौरतलब है कि उनका जीवन उस समय एक निर्णायक मोड़ पर आया जब 1896 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी में पहले भीषण अकाल और फिर प्लेग की महामारी ने लाखों जीवन संकट में डाल दिए। मैडम कामा दिन-रात पीड़ितों की सेवा में जुटी रहीं, लेकिन इस दौरान वह स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गईं।

लंदन प्रवास और राष्ट्रवादी संपर्क

1902 में स्वास्थ्य-लाभ के लिए परिवार ने मैडम कामा को लंदन भेजा। यह प्रवास उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। लंदन में उनकी मुलाकात著名 राष्ट्रवादी हस्तियों श्यामजी कृष्ण वर्मा और दादाभाई नौरोजी से हुई, जिनसे प्रेरित होकर वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से जुड़ गईं।

1905 में उन्होंने लंदन में 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। बाद में पेरिस जाकर उन्होंने वहाँ 'पेरिस इंडियन सोसाइटी' की नींव रखने में भी योगदान दिया। विदेश में बसे भारतीय स्वतंत्रता-सेनानियों के साथ मिलकर उन्होंने स्वाधीनता-केंद्रित साहित्य लिखा और उसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया।

स्टटगार्ट में ऐतिहासिक ध्वजारोहण

22 अगस्त 1907 को स्टटगार्ट में आयोजित दूसरी अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने न केवल मानवाधिकारों और समानता के मुद्दे उठाए, बल्कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता की माँग भी पूरे सभागार के सामने रखी। जब उन्होंने वहाँ ब्रिटिश झंडा देखा, तो उन्होंने उसे हटाकर उस स्थान पर नया भारतीय ध्वज फहराया — जिसे उन्होंने 'भारतीय स्वतंत्रता का झंडा' कहा।

यह ऐसे समय में आया जब भारत में राष्ट्रवादी चेतना अंकुरित हो रही थी और विदेशी मंचों पर भारत की आवाज़ उठाने वाले नेताओं की सख्त ज़रूरत थी। यह इतिहास की पहली घटना थी जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय ध्वज ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

ध्वज की विरासत

स्टटगार्ट में फहराया गया वह ध्वज बाद में भारत लाया गया और पुणे की मराठा और केसरी लाइब्रेरी में संरक्षित किया गया। इतिहासकारों के अनुसार, आज का भारतीय राष्ट्रीय ध्वज मैडम कामा द्वारा डिज़ाइन किए गए उसी ध्वज की अवधारणा पर आधारित है।

26 जनवरी 1962 को डाक और तार विभाग ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी कर उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिया। 13 अगस्त 1936 को 74 वर्ष की आयु में पारसी जनरल हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया — तीन दशकों का निर्वासन झेलते हुए भी उन्होंने स्वाधीनता की लौ कभी बुझने नहीं दी।

मैडम कामा की विरासत आज

मैडम कामा का जीवन दृढ़ता, समर्पण और असीम देशभक्ति का प्रतीक है। यह ऐसे समय में याद करने योग्य है जब भारत अपने स्वतंत्रता-सेनानियों की भूमिका पर गर्व के साथ दृष्टि डालता है। उनकी जयंती — 24 सितंबर — उन तमाम भारतीयों के लिए प्रेरणा का दिन है जो निर्भीक राष्ट्रसेवा को अपना आदर्श मानते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ हथियार नहीं बल्कि विचार और साहस काम आए। स्टटगार्ट में ध्वज फहराना केवल एक प्रतीकात्मक कृत्य नहीं था; यह औपनिवेशिक वैधता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर चुनौती देना था। गौरतलब है कि तीन दशकों के निर्वासन के बावजूद उनका योगदान मुख्यधारा की राष्ट्रीय चर्चा में उतनी जगह नहीं पाता जितना मिलना चाहिए। उनकी जयंती के अवसर पर इस विरासत को स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस इतिहास को पुनः रेखांकित करना है जो भारत की वैश्विक स्वाधीनता-चेतना की नींव था।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में भारतीय ध्वज कब और कहाँ फहराया था?
मैडम भीकाजी कामा ने 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में पहली बार विदेशी धरती पर भारतीय ध्वज फहराया था। उन्होंने वहाँ ब्रिटिश झंडे को हटाकर उसकी जगह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज लहराया।
मैडम भीकाजी कामा का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 को मुंबई के एक समृद्ध पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वराज जी पटेल मुंबई के जाने-माने व्यापारी थे।
स्टटगार्ट में फहराए गए भारतीय ध्वज का क्या हुआ?
स्टटगार्ट में फहराया गया वह ऐतिहासिक ध्वज बाद में भारत लाया गया और पुणे की मराठा और केसरी लाइब्रेरी में संरक्षित किया गया। इतिहासकारों के अनुसार, आज का भारतीय राष्ट्रीय ध्वज मैडम कामा द्वारा डिज़ाइन की गई उसी अवधारणा पर आधारित है।
मैडम कामा स्वतंत्रता आंदोलन से कैसे जुड़ीं?
1902 में इलाज के लिए लंदन गई मैडम कामा की वहाँ श्यामजी कृष्ण वर्मा और दादाभाई नौरोजी से मुलाकात हुई, जिनसे प्रेरित होकर वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हो गईं। उन्होंने 1905 में 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' की स्थापना में योगदान दिया और बाद में पेरिस में 'पेरिस इंडियन सोसाइटी' बनाने में भी मदद की।
मैडम भीकाजी कामा का निधन कब हुआ और उन्हें क्या सम्मान मिला?
मैडम कामा का निधन 13 अगस्त 1936 को 74 वर्ष की आयु में पारसी जनरल हॉस्पिटल में हुआ। 26 जनवरी 1962 को डाक और तार विभाग ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया।
राष्ट्र प्रेस
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