10 अगस्त 2026
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स्लोवाकिया में PM मोदी ने भेंट किया बिहार का 'ठेकुआ', स्थानीय कारोबारियों को वैश्विक बाज़ार की उम्मीद जगी

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स्लोवाकिया में PM मोदी ने भेंट किया बिहार का 'ठेकुआ', स्थानीय कारोबारियों को वैश्विक बाज़ार की उम्मीद जगी

सारांश

पीएम मोदी की स्लोवाकिया में ठेकुआ भेंट महज एक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं — यह बिहार की उस खाद्य विरासत का वैश्विक परिचय है जो वर्षों से अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी। पटना के कारोबारियों को अब ई-कॉमर्स और निर्यात के रास्ते खुलने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया दौरे में वहाँ की संसद के स्पीकर को बिहार का पारंपरिक व्यंजन 'ठेकुआ' भेंट किया।
ठेकुआ का छठ पर्व पर विशेष धार्मिक महत्त्व है और इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
स्थानीय विक्रेता अनिल कुमार ठाकुर और खरीदार शंकर शाह ने इसे बिहार के कारोबार के लिए बड़ा अवसर बताया।
प्रवीण कुमार के अनुसार, इस कदम से ठेकुआ की गूगल सर्च और ई-कॉमर्स माँग बढ़ेगी।
कारोबारी वर्ग को GI टैग और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं से जुड़ने की उम्मीद है।
इस पहल से महिला स्वयं सहायता समूहों और कुटीर उद्योगों को सीधा लाभ मिलने की संभावना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया दौरे के दौरान वहाँ की संसद के स्पीकर को बिहार का पारंपरिक व्यंजन 'ठेकुआ' भेंट किया, जिससे पटना सहित पूरे बिहार में उत्साह की लहर दौड़ गई है। इस कदम को बिहार की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। स्थानीय व्यापारियों और ग्राहकों का मानना है कि इससे 'वोकल फॉर लोकल' अभियान को नई ऊर्जा मिलेगी।

ठेकुआ की सांस्कृतिक पहचान

ठेकुआ बिहार का एक परंपरागत मीठा व्यंजन है, जिसका छठ पर्व पर विशेष धार्मिक महत्त्व है। श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। गौरतलब है कि यह व्यंजन केवल त्योहारों तक सीमित नहीं — सामान्य दिनों में भी इसकी बिक्री होती है और शादी-विवाह जैसे आयोजनों में भी इसे विशेष स्थान प्राप्त है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह उन सैकड़ों स्थानीय खाद्य परंपराओं में से एक है जो वैश्वीकरण की आँधी में धीरे-धीरे विस्मृत होती जा रही थीं।

स्थानीय कारोबारियों की प्रतिक्रिया

ठेकुआ विक्रेता अनिल कुमार ठाकुर ने कहा, 'यह बहुत बड़ी अचीवमेंट है। हमारा बिहार का ठेकुआ वहाँ सर्व किया गया, यह बहुत अच्छी बात है। ठेकुआ को बहुत बड़ा महत्व मिलेगा। जैसे विदेश के लोग उसको पहचानेंगे, वैसे ही हम लोगों की भी पहचान बनेगी।' उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के इस कदम से बिहार के पारंपरिक खाद्य उत्पादों की माँग देश-विदेश में बढ़ेगी, जिसका सीधा लाभ छोटे दुकानदारों, महिला स्वयं सहायता समूहों और कुटीर उद्योगों को मिलेगा।

ठेकुआ खरीदार शंकर शाह ने उत्साहित होते हुए कहा, 'फायदा होगा, हम लोगों का धंधा चलेगा, देश-विदेश में भी यहाँ से एक्सपोर्ट होगा। जैसे ब्रिटानिया बिस्कुट बेचता है, हम लोग ठेकुआ बेचेंगे।' उन्होंने बताया कि उन्हें पटना स्टेशन के पास स्थित इस दुकान के बारे में पता चला, जहाँ शादी-विवाह के लिए विशेष मिठाइयाँ मिलती हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आईआईटी के प्रोफेसर डॉ. प्रवीण कुमार ने इस घटनाक्रम को 'गाँव से ग्लोबल' की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि स्थानीय उत्पाद हज़ारों वर्षों की परंपरा के वाहक हैं, लेकिन प्रचार के अभाव में वे विलुप्त होते जा रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ठेकुआ भेंट किए जाने के बाद अब लोग इसे गूगल पर सर्च करेंगे, इसकी उत्पत्ति और बनाने की विधि जानना चाहेंगे, और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के ज़रिये इसे मँगाना शुरू कर देंगे। उनके अनुसार, 'पीएम मोदी के द्वारा ठेकुआ देने पर उत्पाद का महत्व वैश्विक स्तर पर पहुँच जाता है।'

आम जनता पर असर

स्थानीय व्यापारियों और ग्राहकों का मानना है कि यह कदम विकसित भारत और अमृत काल के उस विज़न के अनुरूप है जिसमें स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक बाज़ार में उचित स्थान दिलाने की परिकल्पना है। यदि ठेकुआ निर्यात की राह पकड़ता है, तो इसका सबसे अधिक लाभ उन महिला उद्यमियों और छोटे कारीगरों को होगा जो वर्षों से इसे बनाते आ रहे हैं।

क्या होगा आगे

कारोबारी वर्ग को उम्मीद है कि इस अंतरराष्ट्रीय चर्चा के बाद सरकार ठेकुआ सहित बिहार के अन्य पारंपरिक खाद्य उत्पादों को GI टैग और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं से जोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार स्थानीय उत्पादों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जोड़ने के लिए कई नीतिगत पहल कर रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रतीकवाद नीतिगत ठोसपन में बदलेगा। बिहार के दर्जनों पारंपरिक खाद्य उत्पाद वर्षों से GI टैग और निर्यात ढाँचे की प्रतीक्षा में हैं — केवल एक कूटनीतिक भेंट से बाज़ार नहीं बनते। 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के वर्षों बाद भी स्थानीय खाद्य उत्पादों का संगठित निर्यात नगण्य है। यदि इस चर्चा को ई-कॉमर्स सूचीकरण, पैकेजिंग मानक और निर्यात सब्सिडी से नहीं जोड़ा गया, तो यह उत्साह भी पिछली कई 'वायरल' सांस्कृतिक घटनाओं की तरह क्षणिक साबित होगा।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने स्लोवाकिया में ठेकुआ क्यों भेंट किया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्लोवाकिया दौरे के दौरान वहाँ की संसद के स्पीकर को बिहार का पारंपरिक व्यंजन ठेकुआ भेंट किया, जो भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और 'वोकल फॉर लोकल' अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। यह कदम स्थानीय खाद्य परंपराओं को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में उठाया गया।
ठेकुआ क्या है और इसका बिहार में क्या महत्त्व है?
ठेकुआ बिहार का एक पारंपरिक मीठा व्यंजन है, जिसे गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है। छठ पर्व पर इसे प्रसाद के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त है और सामान्य दिनों तथा शादी-विवाह जैसे अवसरों पर भी इसकी बिक्री होती है।
इस कदम से बिहार के स्थानीय कारोबारियों को क्या फायदा होगा?
स्थानीय विक्रेताओं और विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय चर्चा के बाद ठेकुआ की गूगल सर्च और ई-कॉमर्स माँग बढ़ सकती है। इससे छोटे दुकानदारों, महिला स्वयं सहायता समूहों और कुटीर उद्योगों को सीधा आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
क्या ठेकुआ को GI टैग मिला हुआ है?
स्रोत में इस बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय कारोबारी वर्ग को उम्मीद है कि इस अंतरराष्ट्रीय चर्चा के बाद सरकार ठेकुआ सहित बिहार के पारंपरिक उत्पादों को GI टैग और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं से जोड़ने की दिशा में कदम उठाएगी।
'वोकल फॉर लोकल' अभियान से ठेकुआ का क्या संबंध है?
केंद्र सरकार का 'वोकल फॉर लोकल' अभियान स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक बाज़ार में बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। आईआईटी प्रोफेसर डॉ. प्रवीण कुमार के अनुसार, पीएम मोदी द्वारा ठेकुआ को विदेश में भेंट किया जाना इसी अभियान की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, जो स्थानीय परंपराओं को वैश्विक मंच तक पहुँचाती है।
राष्ट्र प्रेस
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