125-दिवसीय ग्रामीण रोजगार योजना पर तमिलनाडु सरकार चुप, पीएमके ने माँगा तत्काल जवाब
सारांश
मुख्य बातें
पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के अध्यक्ष अंबुमणि रामदास ने 28 जून 2026 को तमिलनाडु सरकार से केंद्र की नई 125-दिवसीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना पर तत्काल अपना रुख सार्वजनिक करने की माँग की। उन्होंने कहा कि योजना 1 जुलाई से लागू होने वाली है, लेकिन राज्य सरकार की चुप्पी के कारण 69.76 लाख से अधिक ग्रामीण परिवारों की आजीविका अधर में लटकी हुई है।
योजना का स्वरूप और राष्ट्रीय परिदृश्य
केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में संशोधन करते हुए वार्षिक रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। इस संशोधित योजना के लिए केंद्र ने देशभर में ₹95,692 करोड़ आवंटित किए हैं, जिसमें तमिलनाडु का हिस्सा ₹7,957.57 करोड़ निर्धारित है। अंबुमणि रामदास ने बताया कि अब तक 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस योजना को लागू करने की अधिसूचना जारी कर चुके हैं।
पड़ोसी राज्यों का रुख
आंध्र प्रदेश, केरल और पुडुचेरी ने योजना को लागू करने की घोषणा कर दी है। वहीं तेलंगाना और कर्नाटक इसके प्रावधानों का अध्ययन कर रहे हैं और कुछ शर्तों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती देने की संभावना पर विचार कर रहे हैं। तेलंगाना ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि यदि कानूनी चुनौती आगे बढ़ती है, तो वह ग्रामीण श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए राज्य के अपने संसाधनों से एक अलग रोजगार योजना शुरू करेगा।
वित्तीय हिस्सेदारी और राज्य स्वायत्तता का सवाल
अंबुमणि रामदास ने बताया कि संशोधित व्यवस्था में राज्य सरकार की वित्तीय हिस्सेदारी बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई है। यदि तमिलनाडु इस योजना को अपनाता है, तो राज्य को ₹5,305.04 करोड़ का अतिरिक्त योगदान देना होगा, जिससे कुल उपलब्ध राशि ₹13,262.61 करोड़ हो जाएगी। आलोचकों का कहना है कि केंद्र को यह तय करने का अधिक अधिकार दिए जाने से राज्य सरकारों की स्वायत्तता कमज़ोर होती है।
आम जनता पर असर
वर्तमान में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ₹479.49 की मजदूरी दर के आधार पर यह राशि लगभग 27.68 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार उपलब्ध करा सकती है। लेकिन राज्य में लगभग 69.76 लाख ग्रामीण परिवार रोजगार की माँग कर रहे हैं — इस हिसाब से प्रत्येक परिवार को औसतन केवल 40 दिन का ही रोजगार मिल पाएगा, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम है।
चेतावनी: योजना न अपनाई तो क्या होगा
पीएमके अध्यक्ष ने आगाह किया कि यदि तमिलनाडु इस योजना को अस्वीकार करता है, तो मौजूदा मनरेगा आवंटन में बची केवल ₹440.90 करोड़ की राशि उपलब्ध रहेगी। इससे प्रत्येक लाभार्थी को औसतन मात्र 1.3 दिन का रोजगार ही मिल सकेगा, और उसके बाद राज्य सरकार को पूरा कार्यक्रम अपने संसाधनों से चलाना होगा। रामदास ने माँग की कि यदि राज्य केंद्र की योजना अस्वीकार करता है, तो उसे तत्काल एक वैकल्पिक योजना की घोषणा करनी चाहिए — जिससे चुनावी वादे के अनुसार ग्रामीण परिवारों को प्रतिवर्ष 150 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जा सके। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य सरकार पर पहले से ही ग्रामीण कल्याण वादों को पूरा करने का दबाव है।