सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़कर 37 हुई, राष्ट्रपति मुर्मु ने अध्यादेश को दी मंजूरी
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 17 मई 2026 को 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026' को औपचारिक मंजूरी प्रदान कर दी, जिससे देश की सर्वोच्च अदालत में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़कर 37 हो गई है। यह संख्या भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से अलग है, अर्थात् CJI सहित कुल स्वीकृत पद अब 38 हो जाएंगे। लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को देखते हुए यह कदम न्यायिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
अध्यादेश की पृष्ठभूमि
5 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026' को संसद में पेश करने की स्वीकृति दी गई थी। इसके कुछ ही दिनों बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चार नए जजों के पद सृजित करने के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दी। राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किए जाने से यह निर्णय अब विधिक रूप से प्रभावी हो गया है।
सरकार की प्रतिक्रिया
केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस निर्णय की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ने 'सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956' में संशोधन करते हुए इस अध्यादेश को अनुमति प्रदान की है। सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते कार्यभार और लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए यह कदम अपरिहार्य हो गया था।
ऐतिहासिक संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या से जुड़ा पहला कानून 1956 में अस्तित्व में आया था। तब से न्यायपालिका की बढ़ती आवश्यकताओं के अनुरूप समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे हैं। सबसे हालिया बदलाव 2019 में हुआ था, जब जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी। अब 2026 में यह संख्या 37 (CJI के अतिरिक्त) कर दी गई है — सात वर्षों में पहली बार इतना बड़ा विस्तार।
आम जनता पर असर
रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में इस समय लाखों मामले लंबित हैं। जजों की संख्या बढ़ने से अतिरिक्त पीठों का गठन संभव होगा, जिससे सुनवाई की गति तेज हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विशेष रूप से उन नागरिकों को राहत मिलेगी जिनके मामले वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं।
क्या होगा आगे
अध्यादेश के लागू होने के बाद नए जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया कॉलेजियम प्रणाली के तहत आगे बढ़ेगी। संसद के अगले सत्र में इस अध्यादेश की जगह विधेयक पारित कराना होगा, अन्यथा यह छह सप्ताह के भीतर निष्प्रभावी हो जाएगा। न्यायिक सुधार के पैरोकार इसे सही दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं, हालांकि उनका यह भी कहना है कि केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं — नियुक्तियों में पारदर्शिता और विविधता भी सुनिश्चित होनी चाहिए।