प्रियंका गांधी की 'गोमूत्र विशेषज्ञ' टिप्पणी पर देशभर के शिक्षाविदों का विरोध, IIT मद्रास निदेशक के सम्मान में उठी आवाज़
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि को 'गोमूत्र विशेषज्ञ' कहे जाने के बाद देशभर के शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालय प्रमुखों ने एकजुट होकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। 31 जुलाई को सामने आए इस विवाद में कई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने प्रियंका गांधी को खुला पत्र लिखकर अकादमिक गरिमा और सम्मानजनक सार्वजनिक संवाद की माँग की है।
विवाद की पृष्ठभूमि
प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बयान में प्रो. वी. कामकोटि को 'गोमूत्र विशेषज्ञ' कहकर संबोधित किया था। प्रो. कामकोटि देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थान आईआईटी मद्रास के निदेशक हैं और कंप्यूटर इंफ्रास्ट्रक्चर तथा शक्ति माइक्रोप्रोसेसर परियोजना में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। इस टिप्पणी को शिक्षा जगत ने एक वरिष्ठ शिक्षाविद की व्यक्तिगत अवमानना के रूप में देखा है।
शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद स्थित एमडीआई की निदेशक जयंति रंजन ने कहा कि चाहे वैज्ञानिक हों, शिक्षाविद हों या नेता — सभी को अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने कहा, "प्रो. कामकोटि एक बहुत बड़े और सम्मानित शिक्षाविद हैं। उनका काम उल्लेखनीय रहा है। अब समय आ गया है कि इस तरह के झूठे नैरेटिव को रोका जाए। जो लोग ऐसी बातें कर रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि प्रोफेसर कामकोटि ने क्या काम किया है।"
जयंति रंजन ने यह भी जोड़ा कि प्रो. कामकोटि बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं — वे अच्छे क्रिकेटर हैं, वायलिन वादक हैं और संस्कृत के श्लोक भी बोल लेते हैं। उनके अनुसार, "इस तरह की हल्की टिप्पणी करने वाले लोग देश की शैक्षणिक गुणवत्ता और भारतीय विरासत पर गर्व नहीं करते।"
आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर सुमन चक्रवर्ती ने कहा कि वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों की आलोचना पेशेवर आधार पर होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत आक्षेप के रूप में। उनके अनुसार, "अकादमिक और शोध की पवित्रता राजनीति से ऊपर है। किसी गंभीर मुद्दे पर मजाक करना गरिमा के खिलाफ है। मैं व्यक्तिगत रूप से प्रो. कामकोटि की शैक्षणिक उपलब्धियों का सम्मान करता हूँ।"
विश्वविद्यालय प्रमुखों की राय
रीवा के महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. शुभा तिवारी ने कहा कि प्रो. कामकोटि से असहमति हो सकती है और उनके शोध पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं, लेकिन किसी विद्वान का इस तरह मजाक उड़ाना और अपमान करना बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा, "प्रो. कामकोटि ने पिछले 40 साल शिक्षा और शोध को दिए हैं। कंप्यूटर इंफ्रास्ट्रक्चर और शक्ति माइक्रोप्रोसेसर पर उनके काम से भारत का नाम दुनिया में हुआ है।"
भोपाल के एलएनसीटी विश्वविद्यालय के कुलपति नरेंद्र कुमार थापक ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि हर पद के व्यक्ति को आपसी सम्मान और गरिमा मिलनी चाहिए। उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. कैलाश डागा ने इस टिप्पणी को "अत्यंत अशोभनीय" करार दिया और कहा, "ऐसे व्यक्तित्व पर इस प्रकार की टिप्पणी करना सूर्य पर थूकने जैसा है।"
प्रो. कामकोटि का योगदान
गौरतलब है कि प्रो. वी. कामकोटि केवल एक प्रशासनिक पद पर नहीं हैं — उन्होंने शक्ति माइक्रोप्रोसेसर परियोजना के ज़रिए भारत को स्वदेशी चिप निर्माण की दिशा में अग्रणी भूमिका दिलाई है। यह परियोजना भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रो. तिवारी के अनुसार, वैज्ञानिक सोच यही कहती है कि असहमति को तर्क के साथ व्यक्त किया जाए, न कि व्यंग्यात्मक लेबल से।
आगे क्या होगा
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश में शिक्षा और राजनीति के बीच की सीमाओं को लेकर बहस तेज़ हो रही है। शिक्षाविदों का एकजुट विरोध इस मामले को संसदीय और अकादमिक दोनों मंचों पर उठाए जाने का संकेत देता है। यह देखना होगा कि क्या प्रियंका गांधी वाड्रा इस पर कोई स्पष्टीकरण देती हैं या अपनी टिप्पणी का बचाव करती हैं।