प्रियंका गांधी के बयानों पर देशव्यापी विवाद: भगवा जर्सी और प्रो. कामाकोटी पर 215 से अधिक शिक्षाविद एकजुट
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा भारतीय हॉकी टीम की भगवा जर्सी और आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटी पर की गई टिप्पणियों ने 31 जुलाई को देशभर में राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर दी हैं। नेताओं, कुलपतियों और शिक्षाविदों के एक वर्ग ने उनके बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई है, जबकि समाजवादी पार्टी ने जर्सी के रंग परिवर्तन को सरकार द्वारा वैचारिक एजेंडा थोपने की कोशिश करार दिया है।
भगवा जर्सी विवाद: राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद साध्वी प्रज्ञा भारती ने प्रियंका गांधी के भगवा रंग पर उठाए गए सवालों का तीखा जवाब देते हुए कहा कि हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल या क्रिकेट — किसी भी टीम की जर्सी का रंग उनकी अपनी पसंद का विषय है। उन्होंने कहा, 'भगवा त्याग, तपस्या और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है।' साध्वी प्रज्ञा ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव के समय कांग्रेस नेता मंदिरों में जाते हैं और भगवा शॉल ओढ़ते हैं, ऐसे में भगवा रंग पर आपत्ति 'हिपोक्रेसी' है।
विश्व हिंदू परिषद (VHP) के प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि खेलों का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, 'भगवा भारत की संस्कृति, इतिहास, स्वाभिमान और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है — तिरंगे का सर्वोच्च रंग भी भगवा ही है।' उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस बार-बार भगवा रंग को विवादों में घसीटने का प्रयास करती है।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि देशभर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा, पहनावा और संस्कृति को थोपने की कोशिश हो रही है और हॉकी टीम की जर्सी का रंग बदलना उसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
प्रो. कामाकोटी पर टिप्पणी: शिक्षाविद मैदान में
जम्मू स्थित क्लस्टर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर के. एस. चंद्रशेखर ने इस मुद्दे पर एक खुला पत्र जारी किया है, जिसे अब तक 215 से अधिक शिक्षाविदों का समर्थन मिल चुका है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति की योग्यता और योगदान पर टिप्पणी करने से पहले उसके कार्यों और उपलब्धियों को समझना आवश्यक है। उनके अनुसार, 'प्रो. कामाकोटी का भारत के लिए योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है और बिना तथ्यों के उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।'
मध्य प्रदेश के रीवा स्थित महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर शुभा तिवारी ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी विषय के पक्ष और विपक्ष दोनों सुने जाने चाहिए। उन्होंने प्रो. कामाकोटी के चार दशकों के योगदान और 'शक्ति' माइक्रोप्रोसेसर जैसे प्रोजेक्ट के माध्यम से भारत को मिली वैश्विक पहचान का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे वैज्ञानिक का उपहास उचित नहीं है। उन्होंने खुले पत्र का समर्थन किया और संसद में गरिमापूर्ण भाषा के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
गुजरात के सूरत स्थित वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय (VNSGU) के कुलपति डॉ. किशोरसिंह एन. चावड़ा ने कहा कि जब भी किसी वैज्ञानिक या पद्म पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति पर राजनीतिक टिप्पणी की जाएगी, देशभर का कुलपति समुदाय उसका जवाब देगा। उन्होंने वैज्ञानिकों को देश की अमूल्य संपत्ति बताया और कहा कि शोध पर बहस तथ्यों और तर्कों के आधार पर होनी चाहिए।
अकादमिक और राजनीतिक संतुलन की माँग
आईआईएम कलकत्ता के निदेशक आलोक राय ने प्रो. कामाकोटी का समर्थन करते हुए उन्हें भारत में कंप्यूटर विज्ञान की प्रतिष्ठित हस्ती बताया। उन्होंने कहा कि आईआईटी मद्रास ने उनके नेतृत्व में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय परंपरा में गाय से जुड़े उत्पादों का दीर्घकालिक उपयोग रहा है और गोमूत्र के औषधीय गुणों पर त्वचा, प्रतिरोधक क्षमता, पाचन और वजन नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में विभिन्न स्तरों पर शोध उपलब्ध हैं।
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने कहा कि शिक्षाविदों और अकादमिक जगत को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, विपक्ष को नीतिगत मुद्दों पर सरकार को घेरना चाहिए, न कि शिक्षाविदों और कुलपतियों को निशाना बनाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने प्रियंका गांधी के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि यदि किसी वैज्ञानिक को 'गोमूत्र विशेषज्ञ' कहा जाएगा, तो राजनीतिक स्तर पर भी वैसी ही प्रतिक्रियाएं आएंगी, लेकिन नेताओं को परस्पर ऐसी भाषा के प्रयोग से बचना चाहिए।
आगे क्या
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब संसद का सत्र चल रहा है और विपक्ष-सरकार के बीच तनाव पहले से ऊँचा है। गौरतलब है कि प्रो. कामाकोटी के समर्थन में जारी खुले पत्र पर हस्ताक्षरकर्ताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो दर्शाता है कि अकादमिक समुदाय इस मुद्दे पर एकजुट हो रहा है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस विवाद पर और प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।