प्रियंका गांधी के 'गोमूत्र विशेषज्ञ' बयान पर देशभर के कुलपतियों का विरोध, IIT मद्रास निदेशक के अपमान पर शिक्षाविद एकजुट
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा लोकसभा में आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामाकोटी को 'गोमूत्र विशेषज्ञ' कहे जाने के बाद 31 जुलाई को देशभर के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और शिक्षाविदों ने कड़ी आपत्ति जताई। एकाधिक संस्थानों के प्रमुखों ने इस टिप्पणी को वैज्ञानिक समुदाय का अपमान करार दिया और कहा कि संसद जैसी सर्वोच्च विधायी संस्था में इस तरह की भाषा का प्रयोग न केवल अशोभनीय है, बल्कि शोधकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल असर डालती है।
बुंदेलखंड से नालंदा तक — कुलपतियों की प्रतिक्रिया
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी के कुलपति डॉ. मुकेश पांडे ने कहा, 'सार्वजनिक जीवन और संसद में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का समाज और युवाओं पर गहरा असर पड़ता है। वैज्ञानिकों और एकेडमिक्स के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए और मर्यादित संसदीय भाषा का इस्तेमाल विज्ञान और शिक्षा में लोगों का भरोसा बढ़ाता है।'
गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. पूनम टंडन, जो स्वयं एक भौतिक विज्ञानी हैं, ने कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति का किसी वैज्ञानिक की रिसर्च पर टिप्पणी करना उचित नहीं जो वैज्ञानिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'वैज्ञानिक रिसर्च का मूल्यांकन नेचर और साइंस जैसे जर्नल्स में प्रकाशन, पेटेंट, साइटेशन और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर होना चाहिए। विज्ञान को राजनीति से जोड़ना किसी भी देश के विकास के लिए अच्छा नहीं।'
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि प्रो. कामाकोटी देश के प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन उच्चस्तरीय रिसर्च और समाज में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने में लगाया है। उन्होंने चेताया कि 'अगर संसद वैज्ञानिकों से सार्थक बहस करने के बजाय उनका मजाक उड़ाती है, तो यह देश के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी।'
प्रो. कामाकोटी की विशेषज्ञता और योगदान
आईआईएम मुंबई के निदेशक प्रो. मनोज के. तिवारी ने कहा कि प्रो. कामाकोटी को हाल ही में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है और उन्होंने कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि प्रो. कामाकोटी को संबंधित समिति में उनकी कंप्यूटर साइंस पृष्ठभूमि और जेईई परीक्षा प्रबंधन में उनकी विशेषज्ञता के कारण शामिल किया गया था, न कि किसी अन्य कारण से। प्रो. तिवारी ने यह भी कहा कि 'वैज्ञानिक और प्रोफेसर प्रचार या शोहरत के पीछे नहीं भागते — वे बस अपना काम सही ढंग से करते हैं। उनके लिए कम-से-कम सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए।'
मारवाड़ मेडिकल कॉलेज, जोधपुर के कुलपति महेंद्र कुमार असेरी ने कहा कि प्रो. कामाकोटी न केवल आईआईटी मद्रास के निदेशक हैं बल्कि कंप्यूटर विभाग के विशेषज्ञ भी हैं, और उनकी उपलब्धियों को देखते हुए ही सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा है।
एकेडमिक समुदाय की चिंता
विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के कुलपति प्रो. चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि इस प्रकरण ने पूरे शैक्षणिक समुदाय को झकझोर दिया है। उन्होंने कहा, 'हर कोई यह पूछ रहा है कि अगर प्रो. कामाकोटी जैसे वैज्ञानिक के बारे में ऐसी बातें कही जा सकती हैं, तो हम कहाँ खड़े हैं? हम अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं और 2047 तक विकसित भारत के विजन में योगदान दे रहे हैं।'
जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के पूर्व कुलपति डॉ. संजीत गुप्ता ने कहा कि भारत की संस्कृति हमेशा से विद्वानों और बुद्धिजीवियों का सम्मान करने की रही है। उनके अनुसार, 'बिना किसी ठोस आधार के ऐसी टिप्पणियाँ किसी विद्वान का मजाक उड़ाने जैसी हैं और इससे एकेडमिक समुदाय का मनोबल गिरता है।'
राजनीति और विज्ञान के बीच की रेखा
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. प्रदीप शर्मा ने कहा कि संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है और वहाँ शिक्षाविदों या वैज्ञानिकों के बारे में की गई किसी भी टिप्पणी का दूरगामी असर होता है। उन्होंने कहा, 'अगर हमारे शिक्षाविदों के बारे में सम्मान के साथ बात नहीं की जाती, तो इससे गलत संदेश जाता है।'
भरतपुर के प्रोफेसर योगेंद्र कुमार भानु ने सुझाव दिया कि राजनेताओं को शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र राजनेताओं से सर्वथा भिन्न होता है। गुरु गोबिंद सिंह विश्वविद्यालय, बाँसवाड़ा के कुलपति प्रो. के.एस. ठाकुर ने भी कहा कि कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत तभी बनता है जब उस पर गहन शोध किया जाता है, इसलिए वैज्ञानिकों की रिसर्च पर अनर्गल टिप्पणी उचित नहीं है।
आगे क्या
यह विवाद संसद के मानसून सत्र के दौरान उठा है और अब शैक्षणिक जगत में व्यापक बहस का रूप ले चुका है। शिक्षाविदों की माँग है कि संसद में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बारे में बोलते समय तथ्यात्मक आधार और संसदीय मर्यादा का पालन किया जाए। यह देखना होगा कि क्या इस प्रकरण पर संसद के भीतर या बाहर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आती है।