पंजाब का ऋण बोझ: ₹42,481 करोड़ की चुकौती लागत कुल राजस्व के 23% से अधिक — मनीष तिवारी
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 6 अगस्त को खुलासा किया कि पंजाब की ऋण चुकौती लागत — ब्याज और मूलधन दोनों मिलाकर — लगभग ₹42,481 करोड़ है, जो राज्य के कुल राजस्व के 23 प्रतिशत से अधिक है। चंडीगढ़ से तीन बार निर्वाचित और पूर्व केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री तिवारी ने यह बात केंद्र और राज्यों के दीर्घकालिक सार्वजनिक वित्त तथा ऋण की समीक्षा के लिए बुलाई गई संसदीय स्थायी समिति की बैठक में भाग लेने के बाद कही।
राजस्व का गणित: हर रुपए में 23 पैसे कर्ज़ में
तिवारी ने लिखा, 'इसका मतलब है कि पंजाब द्वारा अर्जित प्रत्येक एक रुपए राजस्व में से 23 पैसे केवल ऋण चुकाने में खर्च हो जाते हैं — राजस्व व्यय में से ऋण चुकाने की लागत घटाने पर 71.4 प्रतिशत बचता है।' उन्होंने आगे प्रश्न उठाया कि जब पूंजीगत व्यय — यानी भविष्य की परिसंपत्तियाँ बनाने वाला विकास खर्च — मात्र 5.6 प्रतिशत रह जाता है, तो क्या यह एक टिकाऊ वित्तीय मॉडल है।
कोविड के बाद ऋण-जीडीपी अनुपात में उछाल
तिवारी ने वित्त वर्ष 2019-20 और 2022-23 के बीच की अवधि का हवाला देते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.6 प्रतिशत से बढ़कर 9.2 प्रतिशत हो गया था। पंजाब में भी, जहाँ उस दौरान कांग्रेस सरकार थी, राज्य का ऋण-जीडीएसपी अनुपात 2019-20 में 36.2 प्रतिशत से बढ़कर 41.3 प्रतिशत तक पहुँच गया। इसके बाद मामूली सुधार हुआ, परंतु 2024-25 में यह फिर बढ़कर 39.9 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह ऐसे समय में आया है जब राज्य की वित्तीय स्थिरता पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज़ हो रही है।
भाजपा का आप सरकार पर हमला
एक दिन पहले, पंजाब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकारी कर्मचारियों से किए गए वित्तीय वादे पूरे न होने के कारण राज्य में 'प्रशासनिक आपातकाल' जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। ढिल्लों के अनुसार, सत्ता में आने से पहले AAP ने कर्मचारियों के लंबे समय से लंबित मुद्दों को सुलझाने के आश्वासन दिए थे, जो कथित तौर पर अब तक पूरे नहीं किए गए।
ढिल्लों ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बिजली और आवश्यक प्रशासनिक कार्य बुरी तरह बाधित हुए हैं, और नागरिकों को रोज़मर्रा के कामों के लिए एक सरकारी कार्यालय से दूसरे के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब महत्वपूर्ण विभागों के कर्मचारी हड़ताल पर हों, तब आवश्यक सेवाएँ निर्बाध कैसे रह सकती हैं।
आगे की राह
तिवारी ने पंजाब के राजनेताओं से आग्रह किया कि वे राज्य की वित्तीय स्थिति पर 'गंभीरता से विचार' करें। गौरतलब है कि पंजाब का यह ऋण संकट कोई नई घटना नहीं है — राज्य दशकों से राजकोषीय दबाव में है, और हर सरकार ने इसे अगली सरकार पर छोड़ दिया है। संसदीय स्थायी समिति की इस बैठक के निष्कर्ष भविष्य में केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों की समीक्षा में अहम भूमिका निभा सकते हैं।