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राखीगढ़ी के हड़प्पाकालीन कंकाल अवशेष एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपे, प्राचीन DNA विश्लेषण से मिलेगी नई जानकारी

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राखीगढ़ी के हड़प्पाकालीन कंकाल अवशेष एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपे, प्राचीन DNA विश्लेषण से मिलेगी नई जानकारी

सारांश

राखीगढ़ी की खुदाई में मिले तीन पूर्ण हड़प्पाकालीन कंकाल और अन्य अवशेष अब AnSI की कोलकाता प्रयोगशाला में हैं। प्राचीन DNA, समस्थानिक अध्ययन और अस्थि-विज्ञान के ज़रिए 550 हेक्टेयर में फैली इस सभ्यता के लोगों की वंशावली, आहार और रोग-इतिहास की परतें खुलने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

ASI ने राखीगढ़ी से प्राप्त मानव कंकाल अवशेष AnSI को 22 जून को औपचारिक रूप से सौंपे।
2025-26 फील्ड सीजन में टीला नंबर 7 पर आठ कब्रें मिलीं; तीन पूर्ण कंकाल कोलकाता स्थित AnSI प्रयोगशाला भेजे गए।
शोध में प्राचीन DNA विश्लेषण , स्थिर समस्थानिक अध्ययन , पुरा-रोग विज्ञान और पर्यावरण पुनर्निर्माण तकनीकें उपयोग होंगी।
राखीगढ़ी लगभग 550 हेक्टेयर में फैला सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल है।
यह हस्तांतरण ASI और AnSI के बीच हाल ही में हुए MoU के तहत संपन्न हुआ।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हरियाणा के ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल राखीगढ़ी से 2025-26 फील्ड सीजन के दौरान खुदाई में प्राप्त मानव कंकाल अवशेषों को औपचारिक रूप से एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (AnSI) को सौंप दिया है। 22 जून को एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यह हस्तांतरण दोनों संस्थाओं के बीच हाल ही में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गत संपन्न हुआ है।

क्या मिला और कहाँ से

ASI की ग्रेटर नोएडा स्थित खुदाई शाखा-II ने टीला नंबर 7 पर कुल आठ कब्रें खोजीं, जिस क्षेत्र की पहले से कब्रिस्तान के रूप में पहचान की जा चुकी थी। इनमें से तीन पूर्ण मानव कंकाल और अन्य कब्रों से प्राप्त कंकाल के टुकड़ों को विस्तृत वैज्ञानिक जाँच के लिए कोलकाता स्थित AnSI के प्राचीन मानव कंकाल रिपॉजिटरी एवं प्रयोगशाला में भेजा गया है। शेष कंकाल सामग्री भी कुछ दिनों में स्थानांतरित किए जाने की उम्मीद है।

किन वैज्ञानिक तकनीकों का होगा उपयोग

शोधकर्ताओं के अनुसार ये अवशेष आधुनिक विज्ञान के लिए एक दुर्लभ अवसर प्रस्तुत करते हैं। इन पर प्राचीन DNA विश्लेषण, स्थिर समस्थानिक अध्ययन (Stable Isotope Studies), अस्थि-विज्ञान (Osteology), पुरा-रोग विज्ञान (Paleopathology) और पर्यावरण पुनर्निर्माण जैसी बहु-विषयी तकनीकें लागू की जाएंगी। इनसे हड़प्पा काल के दौरान मानव वंशावली, प्रवासन पैटर्न, आहार, रोगों की व्यापकता और मानव-पर्यावरण संबंधों पर महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की संभावना है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

AnSI के निदेशक प्रोफेसर बी.वी. शर्मा ने कहा कि यह बहु-विषयी शोध सिंधु-सरस्वती सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्रों में से एक की समझ को नई गहराई देगा। आंध्र विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक प्रोफेसर विजय प्रकाश ने इस हस्तांतरण को एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त जैविक विरासत का वैज्ञानिक विश्लेषण हो और उसे राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा भावी पीढ़ियों के लाभ हेतु संरक्षित किया जाए।

लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह ने इसे भारत की पैलियो-एंथ्रोपोलॉजिकल शोध परंपरा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक मील का पत्थर बताया। उनके अनुसार मानव जीव विज्ञान और ऑस्टियोलॉजी में AnSI की विशेषज्ञता उसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता की जनसंख्या के इतिहास, स्वास्थ्य, जीवनशैली और सांस्कृतिक अनुकूलन को नए सिरे से समझने की मजबूत स्थिति में रखती है। पुणे के डेक्कन कॉलेज के पूर्व प्राध्यापक और मानवविज्ञानी प्रोफेसर सुभाष वालिम्बे ने जोर दिया कि शहरीकरण ने मानव की जैविक और रोग-संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित किया, यह समझने के लिए अवशेषों की गहन मानववैज्ञानिक जाँच अपरिहार्य है।

राखीगढ़ी का महत्व

हरियाणा में लगभग 550 हेक्टेयर में फैला राखीगढ़ी सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल है। यहाँ प्रारंभिक हड़प्पा से लेकर परिपक्व हड़प्पा काल तक की निरंतर बसावट के प्रमाण मिले हैं — जिनमें नियोजित बस्तियाँ, जल निकासी प्रणाली, शिल्प उत्पादन केंद्र, व्यापार नेटवर्क और कब्रिस्तान शामिल हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर प्राचीन सभ्यताओं के जनसंख्या-इतिहास को लेकर शोध तेज़ी से बढ़ रहा है।

आगे क्या होगा

अधिकारियों ने बताया कि ASI और AnSI के बीच यह सहयोग पुरातत्व, मानवविज्ञान, आनुवंशिकी और पर्यावरण विज्ञान को एक साथ लाने का महत्वाकांक्षी प्रयास है। राखीगढ़ी से प्राप्त अवशेषों से दुनिया की आरंभिक शहरी सभ्यताओं में से एक की उत्पत्ति, स्वास्थ्य, प्रवासन और जैविक इतिहास को समझने में उल्लेखनीय प्रगति की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा डेटा के प्रकाशन की पारदर्शिता और समयसीमा में होगी — भारत में पुरातात्विक शोध के परिणाम अक्सर दशकों तक अप्रकाशित रहते हैं। 2019 में राखीगढ़ी से जुड़े प्राचीन DNA अध्ययन ने वैश्विक ध्यान खींचा था, किंतु उसकी व्याख्याओं पर विद्वानों में मतभेद बना रहा। नई बहु-विषयी पहल इन विवादों को सुलझाने का अवसर है — बशर्ते शोध खुले पहुँच (open access) में प्रकाशित हो और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ साझा किया जाए।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राखीगढ़ी से मिले कंकाल अवशेष AnSI को क्यों सौंपे गए?
ASI और AnSI के बीच हाल ही में हुए MoU के तहत ये अवशेष इसलिए सौंपे गए ताकि AnSI की विशेषज्ञ प्रयोगशालाओं में प्राचीन DNA विश्लेषण, अस्थि-विज्ञान और पुरा-रोग विज्ञान जैसी उन्नत तकनीकों से इनका अध्ययन किया जा सके। इससे हड़प्पा काल की जनसंख्या, स्वास्थ्य और जीवनशैली पर नई जानकारी मिलने की उम्मीद है।
राखीगढ़ी की खुदाई में क्या-क्या मिला?
2025-26 फील्ड सीजन में ASI की ग्रेटर नोएडा शाखा-II ने टीला नंबर 7 पर आठ कब्रें खोजीं। इनमें तीन पूर्ण मानव कंकाल और अन्य कब्रों से कंकाल के टुकड़े मिले, जिन्हें अब कोलकाता स्थित AnSI की प्राचीन मानव कंकाल रिपॉजिटरी एवं प्रयोगशाला में भेजा गया है।
राखीगढ़ी का पुरातात्विक महत्व क्या है?
हरियाणा में लगभग 550 हेक्टेयर में फैला राखीगढ़ी सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात स्थल है। यहाँ प्रारंभिक हड़प्पा से लेकर परिपक्व हड़प्पा काल तक की निरंतर बसावट के प्रमाण मिले हैं, जिनमें नियोजित बस्तियाँ, जल निकासी प्रणाली और कब्रिस्तान शामिल हैं।
इन कंकालों के अध्ययन से क्या जानकारी मिल सकती है?
शोधकर्ताओं के अनुसार प्राचीन DNA विश्लेषण, स्थिर समस्थानिक अध्ययन और पुरा-रोग विज्ञान के ज़रिए हड़प्पाकालीन लोगों की वंशावली, प्रवासन पैटर्न, आहार, रोगों की व्यापकता और पर्यावरण के साथ उनके संबंधों पर महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है। यह विश्व की आरंभिक शहरी सभ्यताओं के जैविक इतिहास को समझने में भी सहायक होगा।
ASI और AnSI के बीच यह सहयोग कितना महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों के अनुसार यह सहयोग भारत की पैलियो-एंथ्रोपोलॉजिकल शोध परंपरा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह पुरातत्व, मानवविज्ञान, आनुवंशिकी और पर्यावरण विज्ञान को एकीकृत करने का पहला बड़ा संस्थागत प्रयास है।
राष्ट्र प्रेस
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