रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशी ड्रोन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए नया फ्रेमवर्क जारी किया
सारांश
Key Takeaways
- स्वदेशी ड्रोन की सुरक्षा के लिए नया फ्रेमवर्क जारी किया गया है।
- इसमें परीक्षण प्रक्रिया को सुदृढ़ किया गया है।
- चीनी भागों के उपयोग को कम करने पर जोर दिया गया है।
- सशस्त्र बलों के लिए सुरक्षित ड्रोन तैयार करने का लक्ष्य है।
- ड्रोन की खरीद के लिए सख्त नियम लागू हैं।
नई दिल्ली, 26 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। आधुनिक युग के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक ड्रोन, एक ओर जहां सुरक्षा के लिए वरदान साबित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इनकी तकनीक का दुरुपयोग नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न कर रहा है। भारतीय सेना तेजी से स्वदेशी ड्रोन युद्धक बना रही है और उनकी क्षमताओं को बढ़ा रही है। हालाँकि, बड़ी कठिनाई चीनी और अन्य विदेशी भागों का उपयोग है। सेना लंबे समय से एक ऐसा फ्रेमवर्क विकसित करने में लगी थी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्वदेशी ड्रोन पूरी तरह से सुरक्षित हों।
अब यह फ्रेमवर्क तैयार हो चुका है। रक्षा मंत्रालय ने इस ड्राफ्ट को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर जारी किया है।
34 पेज के इस ड्राफ्ट में परीक्षण से जुड़े सभी पहलुओं को विस्तार से शामिल किया गया है। इसमें ड्रोन के महत्वपूर्ण घटकों की पहचान उनकी संवेदनशीलता और महत्त्व के आधार पर की गई है, और घटक स्तर पर परीक्षण को निर्धारित करने पर जोर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, इस फ्रेमवर्क का कार्यान्वयन आरएफआई (सूचना के लिए अनुरोध) चरण से शुरू होगा, ताकि उद्योग को आरंभ से ही ऐसे ड्रोन विकसित करने के लिए मार्गदर्शन मिल सके जो सभी आवश्यक परीक्षणों को पास कर सकें।
इसका उद्देश्य केवल परीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि सशस्त्र बलों के लिए ऐसे सुरक्षित ड्रोन तैयार करना है जो डेटा चोरी, नेटवर्क से समझौता और अनधिकृत पहुँच जैसे साइबर खतरों से सुरक्षित हों।
फिलहाल यह फ्रेमवर्क मिनी, माइक्रो और स्मॉल क्वाडकॉप्टर तथा हेक्साकॉप्टर के लिए लागू है, लेकिन भविष्य में इसे मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस (एमएएलई) और हाई एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस (एचएएलई) जैसे उन्नत मानव रहित हवाई प्रणालियों पर भी लागू किया जा सकेगा।
फ्रेमवर्क के अनुसार, ड्रोन की खरीद से पहले हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों की विस्तृत परीक्षण होंगे। इसमें वल्नरेबिलिटी और पेनिट्रेशन टेस्ट, एन्क्रिप्शन और सिक्योर बूट टेस्ट, कोड सिग्नेचर और फर्मवेयर वैलिडेशन शामिल होंगे। केवल उन ड्रोन को खरीद प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा जो इन सभी परीक्षणों में सफल होंगे। चूँकि माइक्रोचिप और संचार उपकरणों का पूर्ण स्वदेशी उत्पादन अभी संभव नहीं है, इसलिए अंतरिम समाधान के तौर पर सर्टिफिकेशन और टेस्टिंग सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।
फ्रेमवर्क में संभावित खतरों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, दुश्मन ड्रोन और नियंत्रण स्टेशन के बीच संचार को इंटरसेप्ट कर सकते हैं, फर्जी आदेश भेज सकते हैं या ड्रोन का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं। जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग के माध्यम से ड्रोन को रास्ते से भटकाया जा सकता है, और ड्रोन से जुटाए गए डेटा की चोरी या उसमें छेड़छाड़ भी एक बड़ा खतरा है।
फ्लाइट कंट्रोलर, फर्मवेयर, जीपीएस/आईएनएस सिस्टम, सेंसर, ट्रांसमिशन-रिसेप्शन यूनिट और ग्राउंड कंट्रोल सॉफ्टवेयर को सबसे संवेदनशील घटकों के रूप में मान्यता दी गई है। इनमें से किसी एक में भी कमजोरी होने पर पूरा ड्रोन सिस्टम खतरे में पड़ सकता है। विदेशी घटकों का उपयोग करने से यह जोखिम और बढ़ जाता है, क्योंकि अपडेट या फर्मवेयर के माध्यम से बिना जानकारी के डेटा बाहर भेजा जा सकता है।
इसलिए, सरकार ने “सुरक्षित डिजाइन” और स्वदेशी निर्माण पर विशेष जोर दिया है।
भारतीय सेना ने बड़ी संख्या में ड्रोन की खरीद की है और कई सौदों की प्रक्रिया अभी जारी है। इनमें लॉजिस्टिक और सर्विलांस ड्रोन शामिल हैं। खरीद के लिए पहले से ही सख्त नियम और प्रोटोकॉल लागू हैं। सेना ने चीनी भागों वाले ड्रोन से जुड़े कई अनुबंध भी रद्द किए हैं। अब तक स्वदेशी कंपनियों से खरीद के दौरान एक सेल्फ-सर्टिफिकेट लिया जाता था, जिसमें यह घोषित करना होता था कि उत्पाद में कोई चीनी भाग नहीं हैं। हालाँकि, कुछ मामलों में सर्टिफिकेट देने के बावजूद उत्पादों में चीनी भाग पाए गए, जिसके चलते सेना ने एक कंपनी का अनुबंध रद्द कर दिया। इस कंपनी से तीन प्रकार के लॉजिस्टिक ड्रोन खरीदे जाने थे।
चीनी हैकर्स साइबर हमलों के लिए कुख्यात माने जाते हैं। बाजार में उपलब्ध अधिकांश ड्रोन या क्वाडकॉप्टर या तो चीनी होते हैं या उनमें चीनी भाग लगे होते हैं। सेना ने एक नीति भी बनाई थी कि अब कंपनियों को यह प्रमाणित करना होगा कि उनके उत्पाद में कोई दुर्भावनापूर्ण कोड नहीं है, जो ड्रोन को हैक कर सके या नेटवर्क को नुकसान पहुंचा सके। कंपनियों द्वारा दिए जा रहे सर्टिफिकेट की कई स्तरों पर सघन जांच की जा रही है। जिन ड्रोन में चीनी भाग पाए जाते हैं, उन्हें तुरंत प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है और संबंधित अनुबंध भी रद्द कर दिए जाते हैं।