ड्रोन और काउंटर ड्रोन की युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका, आत्मनिर्भर ड्रोन इकोसिस्टम की आवश्यकता: राजनाथ सिंह
सारांश
Key Takeaways
- ड्रोन और काउंटर ड्रोन युद्ध की रणनीति में महत्वपूर्ण हैं।
- भारत को ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता है।
- एमएसएमई का योगदान रक्षा क्षेत्र में बढ़ाने की आवश्यकता है।
- सरकार द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विकास किया जा रहा है।
- 2030 तक स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक हब बनने का लक्ष्य।
नई दिल्ली, 19 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में अपने संबोधन में कहा कि आज जब पूरी दुनिया रूस और यूक्रेन के साथ-साथ ईरान-इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष को देख रही है, तो यह स्पष्ट है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन्स और काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
उन्होंने कहा कि भारत को एक ऐसा ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हों। यह आत्मनिर्भरता केवल उत्पादों तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपोनेंट के स्तर पर भी आवश्यक है। अर्थात, ड्रोन के मॉड्यूल, सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी सभी भारत में निर्मित हों। यह कार्य आसान नहीं है क्योंकि अधिकांश देशों में जहां ड्रोन्स बनाए जाते हैं, वहां कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट चीन से आयात किए जाते हैं।
नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव का उद्देश्य स्वदेशी रक्षा उपकरण के निर्माण को बढ़ावा देना है। यह भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए एक मजबूत आधार स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। विशेष रूप से प्राइवेट कंपनियों, छोटे और मध्यम उद्योगों, यानि एमएसएमई को इस क्षेत्र में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि वे भी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में योगदान दे सकें। राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की रक्षा तैयारियों और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए यह आवश्यक है कि भारत ड्रोन निर्माण में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बने।
उन्होंने यहां उपस्थित एमएसएमई और अन्य लोगों से अपील की कि इस कार्य में देश को आपकी सभी की आवश्यकता है। सरकार की ओर से आपको हर प्रकार का समर्थन मिलेगा। हमें मिलकर मिशन मोड में काम करना होगा ताकि 2030 तक भारत स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक हब बन जाए।
उन्होंने कहा कि किसी भी देश के डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को बनाने में बड़ी इंडस्ट्रीज, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और इनोवेटर्स की भूमिका होती है। इसके साथ ही, सरकार की तरफ से स्पष्ट नीति का भी होना आवश्यक है। कई बार बड़े परिवर्तन एक छोटे विचार से शुरू होते हैं। इसलिए जो अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं, यह मानकर चलिए कि आपकी छोटी शुरुआत कल बड़ी सफलता में बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि आज भी भारत की जीडीपी में इंडस्ट्री का योगदान लगभग 15-16 प्रतिशत है, जो यह दर्शाता है कि एमएसएमई के विस्तार के लिए अपार संभावनाएं हैं। विशेष रूप से निर्माण क्षेत्र के विकास से अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है। अब इस दिशा में आगे बढ़ने की जिम्मेदारी उद्योग जगत और इनोवेटर्स पर है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि यह हम सबका राष्ट्र धर्म है। एक दशक में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 के बाद प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र के विस्तार पर लगातार ध्यान दिया है। एमएसएमई के पंजीकरण और पहचान को सरल बनाने के लिए, उद्यम पोर्टल और उद्यम अस्सिट पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स स्थापित किए गए हैं। ताकि छोटे उद्योगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़कर, सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
उन्होंने कहा, "यदि मैं आंकड़ों की बात करूं, तो यह परिवर्तन साफ दिखाई देता है। 2012-13 के आसपास देश में एमएसएमई की संख्या लगभग 4.67 करोड़ थी। हाल के आंकड़ों के अनुसार, यह संख्या लगभग 8 करोड़ के आसपास पहुंच गई है। जब हम सभी मिलकर काम करेंगे, तभी एक मजबूत इनोवेशन ईको सिस्टम बनेगा। यदि हम सभी मिलकर पूरी शक्ति और समर्पण के साथ आगे बढ़ें, तभी हम अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे।"
उन्होंने बताया कि 58 प्रोटोटाइप को खरीद के लिए मंजूरी मिल चुकी है, जिनकी औसत मूल्य लगभग 3,853 करोड़ रुपए है। 45 प्रक्योरमेंट कांट्रेक्ट भी साइन किए जा चुके हैं, जिनकी मूल्य लगभग 2,326 करोड़ रुपए है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि आज इनोवेशन धीरे-धीरे उत्पाद और तकनीक के रूप में सामने आ रहा है, और इसमें हमारे स्टार्टअप्स और एमएसएमई की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।