1 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति पर संतों का विरोध: 'आस्था का केंद्र कॉरपोरेट संस्था नहीं'

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति पर संतों का विरोध: 'आस्था का केंद्र कॉरपोरेट संस्था नहीं'

सारांश

अयोध्या के राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति पर साधु-संत समुदाय दो राय में बँटा है — एक तरफ पुजारी देवेश आचार्य का सीधा विरोध, दूसरी तरफ महंत राजू दास की सशर्त स्वीकृति। केंद्र में सवाल एक ही है: क्या आस्था के केंद्र को कॉरपोरेट ढाँचे में ढाला जाना चाहिए?

मुख्य बातें

हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेश आचार्य ने राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति का विरोध करते हुए कहा कि यह आस्था का केंद्र है, व्यापारिक संस्था नहीं।
आचार्य के अनुसार भारत के जिन मंदिरों में सीईओ हैं, वहाँ भ्रष्टाचार चरम पर है।
महंत राजू दास ने सीईओ का सशर्त स्वागत किया, लेकिन माँग की कि मंदिर में प्रतिदिन 15,000–20,000 श्रद्धालुओं को भोजन कराया जाए और अयोध्या की गौशालाओं व जीर्ण मंदिरों को ट्रस्ट गोद ले।
शशिकांत दास ने कहा कि सीईओ नियुक्ति सरकार की मंशा के अनुरूप है, परंतु धार्मिक-सांस्कृतिक पद्धति की समझ एक गंभीर विषय है।
तीनों संतों की राय में साझा बात यह है कि पूजा-अर्चना की व्यवस्था साधु-संतों के हाथ में रहनी चाहिए।

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति को लेकर धार्मिक जगत में तीखी बहस छिड़ गई है। हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेश आचार्य, महंत राजू दास और शशिकांत दास ने इस नियुक्ति पर खुलकर अपनी राय रखी है — जिसमें विरोध भी है और सशर्त स्वीकृति भी। 1 सितंबर को सामने आई इन प्रतिक्रियाओं ने मंदिर प्रबंधन के स्वरूप पर एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।

संतों की आपत्ति: आस्था बनाम प्रबंधन

हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेश आचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राम मंदिर आस्था का केंद्र है, न कि कोई व्यापारिक प्रतिष्ठान। उनके अनुसार, 'सीईओ आमतौर पर व्यापारिक संस्थानों से जुड़े होते हैं और आस्था के केंद्र में सीईओ की कोई ज़रूरत नहीं है। इसके लिए रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र और धार्मिक समिति पर्याप्त है।' उन्होंने बताया कि पूरे अयोध्या में साधु-संत समुदाय और धार्मिक समिति के कुछ सदस्यों ने भी इस नियुक्ति का विरोध किया है।

देवेश आचार्य ने यह भी कहा कि भारत के जिन मंदिरों में सीईओ हैं, वहाँ भ्रष्टाचार चरम पर है। उनका तर्क था कि चढ़ावा विवाद जैसे मामलों में सीईओ को आसानी से हटाकर मुद्दे को दबाया जा सकता है — जो कि एक सतर्कता की दृष्टि से चिंताजनक पहलू है। साथ ही उन्होंने मंदिर में होने वाली मासिक समीक्षा बैठकों की सराहना की और कहा कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।

महंत राजू दास की माँगें

हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने सीईओ नियुक्ति पर सीधा विरोध दर्ज करने के बजाय कुछ ठोस माँगें रखीं। उन्होंने कहा कि राम मंदिर में प्रतिदिन 15,000 से 20,000 श्रद्धालुओं को भोजन कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने अयोध्या की बदहाल गौशालाओं और जीर्ण-शीर्ण मंदिरों को रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा गोद लेने की अपील की।

राजू दास ने यह भी कहा कि मंदिर में पूजा-अर्चना की व्यवस्था साधु-संतों के हाथ में रहनी चाहिए। उनके शब्दों में, 'ठाकुर जी की सेवा, राजभोग और सत्कार साधु सही तरीके से करते हैं।' उन्होंने सीईओ का स्वागत करते हुए भी यह स्पष्ट किया कि परंपराओं का सम्मान अनिवार्य है और चढ़ावा विवाद जैसे मामलों पर पारदर्शी तरीके से काम होना चाहिए।

शशिकांत दास का सतर्क रुख

शशिकांत दास ने इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा कि सीईओ की नियुक्ति सरकार की मंशा के अनुरूप हो रही है और केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार तथा जिला प्रशासन के अधिकारी मंदिर व्यवस्था की देखरेख कर रहे थे। हालाँकि उन्होंने एक गंभीर सवाल उठाया — कि राम मंदिर की पूजा-पाठ संचालन की पद्धति धार्मिक और सांस्कृतिक है, ऐसे में एक सीईओ को इसकी कितनी समझ होगी। उन्होंने यह भी कहा कि अंततः ट्रस्ट जो निर्णय लेगा, वह सर्वमान्य होगा।

व्यापक संदर्भ: मंदिर प्रबंधन और धार्मिक परंपरा

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश के कई प्रमुख मंदिरों — जैसे तिरुपति बालाजी और शिरडी साईं बाबा मंदिर — में पेशेवर प्रबंधन ढाँचे लागू हैं। गौरतलब है कि इन मंदिरों में भी समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं और प्रबंधकीय विवादों की खबरें आती रही हैं। राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति का सवाल दरअसल एक बड़े प्रश्न को सामने लाता है — क्या धार्मिक स्थलों का प्रशासन पारंपरिक संत-समुदाय के हाथ में रहे या आधुनिक कॉरपोरेट प्रबंधन को अपनाया जाए।

आलोचकों का कहना है कि बिना स्पष्ट जवाबदेही तंत्र के, इस तरह की नियुक्तियाँ मंदिर की धार्मिक पहचान और श्रद्धालुओं के विश्वास को प्रभावित कर सकती हैं। आगे यह देखना होगा कि रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट संतों की आपत्तियों को किस हद तक संज्ञान में लेता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह नियुक्ति उन्हीं विवादों को आमंत्रित कर सकती है जिनसे बचने के लिए इसे लाया गया है।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति क्यों हो रही है?
रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर के प्रशासनिक और परिचालन प्रबंधन को व्यवस्थित करने के लिए सीईओ नियुक्त करने का निर्णय लिया है। यह कदम मंदिर में बढ़ती श्रद्धालु संख्या और चढ़ावा विवाद जैसे मुद्दों के बाद उठाया गया है।
संतों को राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति से क्या आपत्ति है?
संतों का कहना है कि सीईओ व्यापारिक संस्थाओं से जुड़ा पद है और आस्था के केंद्र में इसकी ज़रूरत नहीं। हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेश आचार्य ने तर्क दिया कि जहाँ-जहाँ मंदिरों में सीईओ हैं, वहाँ भ्रष्टाचार बढ़ा है।
महंत राजू दास का इस नियुक्ति पर क्या रुख है?
महंत राजू दास ने सीईओ का सशर्त स्वागत किया है। उन्होंने माँग की है कि परंपराओं का सम्मान हो, पूजा-अर्चना संतों के हाथ में रहे और मंदिर में प्रतिदिन 15,000–20,000 श्रद्धालुओं को भोजन कराने की व्यवस्था की जाए।
शशिकांत दास ने सीईओ नियुक्ति पर क्या कहा?
शशिकांत दास ने कहा कि यह नियुक्ति सरकार की मंशा के अनुरूप है और ट्रस्ट का निर्णय सर्वमान्य होगा। हालाँकि उन्होंने सवाल उठाया कि राम मंदिर की धार्मिक-सांस्कृतिक पूजा पद्धति की जानकारी एक सीईओ को कितनी होगी।
क्या भारत के अन्य प्रमुख मंदिरों में सीईओ हैं?
हाँ, तिरुपति बालाजी और शिरडी साईं बाबा जैसे बड़े मंदिरों में पेशेवर प्रबंधन ढाँचे लागू हैं। हालाँकि इन मंदिरों में भी समय-समय पर वित्तीय और प्रशासनिक विवाद सामने आते रहे हैं, जिसे संत समुदाय अपनी आपत्ति के समर्थन में उद्धृत करता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 12 मिनट पहले
  2. 5 घंटे पहले
  3. 2 सप्ताह पहले
  4. 2 सप्ताह पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 1 महीना पहले
  8. 2 महीने पहले