राम मंदिर सीईओ नियुक्ति पर संत समाज का विरोध, आंदोलन की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होने के बाद संत समाज में तीव्र नाराजगी उभर आई है। 12 अगस्त 2026 को सामने आई इस प्रतिक्रिया में संतों ने सीईओ पद को अयोध्या की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के विरुद्ध बताते हुए इसे राम मंदिर के कथित सरकारीकरण की दिशा में उठाया गया कदम करार दिया है। संत समाज ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और सरकार को चेतावनी दी है कि यदि यह नियुक्ति प्रक्रिया वापस नहीं ली गई, तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
विरोध की पृष्ठभूमि
संतों का कहना है कि राम मंदिर का संचालन किसी कॉरपोरेट संस्थान की तरह नहीं, बल्कि अयोध्या की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब सीईओ पद के लिए आवेदन मंगाए जाने और साक्षात्कार प्रक्रिया शुरू होने की खबरें सामने आई हैं। गौरतलब है कि मंदिर के संचालन के लिए पहले से ही एक ट्रस्ट और एक धार्मिक समिति गठित है, जिसमें अयोध्या के वरिष्ठ संत शामिल हैं।
संतों के प्रमुख आरोप
हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेशाचार्य ने सीईओ नियुक्ति प्रक्रिया को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह आवेदन मंगाए गए और इंटरव्यू की बात सामने आ रही है, उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बड़ी कंपनी या फैक्ट्री में सीईओ की नियुक्ति हो रही हो। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मंदिर संचालन के लिए ट्रस्ट का गठन हो चुका है, तो सीईओ की आवश्यकता क्यों? देवेशाचार्य ने यह भी कहा कि जिस विश्व हिंदू परिषद ने संतों के साथ मिलकर मठ-मंदिरों को सरकारी तंत्र से मुक्त कराने की बात कही थी, उसी से जुड़े लोगों द्वारा यह प्रक्रिया आगे बढ़ाना विरोधाभासी है।
महंत सीताराम दास ने आरोप लगाया कि राम जन्मभूमि मंदिर में सीईओ की नियुक्ति के ज़रिए 'पिछले दरवाजे से सरकारीकरण' की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक पद की आवश्यकता है, तो वैष्णव परंपरा से जुड़े, भक्ति भाव से समर्पित संत को प्रधान सेवक या धर्माधिकारी की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संत समाज इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेगा।
महंत वरुण दास ने कहा कि अयोध्या के मठ-मंदिरों की परंपरागत व्यवस्था में धर्माधिकारी, पुजारी, भंडारी, कोठारी और महंत जैसे पदों के माध्यम से संचालन होता आया है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि आज सीईओ की नियुक्ति होती है, तो भविष्य में इसी रास्ते से राम जन्मभूमि मंदिर के पूर्ण सरकारीकरण की नींव रखी जा सकती है।
परंपरा बनाम प्रशासन का टकराव
यह विवाद मूलतः दो दृष्टिकोणों के बीच टकराव को उजागर करता है — एक तरफ आधुनिक संस्थागत प्रबंधन की ज़रूरत, और दूसरी तरफ सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा की रक्षा का आग्रह। आलोचकों का कहना है कि देश के अन्य प्रमुख मंदिरों — जैसे तिरुपति और शिरडी — में सरकारी या अर्ध-सरकारी प्रबंधन के अनुभव मिले-जुले रहे हैं, और राम मंदिर के संदर्भ में संतों की यह चिंता उसी पृष्ठभूमि में देखी जानी चाहिए।
आगे क्या होगा
संत समाज ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और सरकार से सीईओ नियुक्ति प्रक्रिया पर पुनर्विचार की माँग की है। यदि यह नियुक्ति आगे बढ़ती है, तो संगठित आंदोलन की चेतावनी दी गई है। ट्रस्ट की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह मामला आने वाले दिनों में अयोध्या की धार्मिक राजनीति का केंद्रबिंदु बन सकता है।