राम मंदिर में सीईओ नियुक्ति का विरोध: अयोध्या के साधु-संतों ने कहा — सरकारी दखल बर्दाश्त नहीं
सारांश
मुख्य बातें
अयोध्या के प्रमुख साधु-संतों ने 12 जुलाई 2025 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की प्रस्तावित नियुक्ति का कड़ा विरोध किया है। संतों का कहना है कि यह कदम मंदिर में 'पिछले दरवाजे से सरकारीकरण' की कोशिश है, जो सनातन परंपरा और मर्यादा के विरुद्ध है। यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच अभी जारी है।
मुख्य घटनाक्रम
तपस्वी छावनी के महंत परमहंस महाराज ने स्पष्ट कहा कि ट्रस्ट में नई नियुक्तियों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आजीवन सदस्य के रूप में शामिल किया जाए, साथ ही हनुमानगढ़ी के एक संत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के योग्य प्रतिनिधियों को भी स्थान मिले। उन्होंने कहा, 'सरकार का दखल किसी भी मंदिर में नहीं होना चाहिए।' उनका तर्क था कि यदि भविष्य में कोई अधर्मी सरकार सत्ता में आई तो CEO पद के माध्यम से मंदिर प्रबंधन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।
परंपरा बनाम प्रशासन का टकराव
आर्य संत वरुण दास महाराज ने कहा कि मंदिर संचालन की परंपरागत पाँच-स्तरीय व्यवस्था — महंत, अधिकारी, पुजारी, कोठारी और भंडारी — पहले से मौजूद थी। उनके अनुसार, राम मंदिर में पुजारियों को 'कर्मचारी' का दर्जा देकर उन्हें चंदन लगाने और चरणामृत देने जैसी धार्मिक परंपराओं से रोका जा रहा है, जो 'मनमानी और परंपरा के खिलाफ' है। उन्होंने चेतावनी दी कि CEO व्यवस्था लागू होने पर 'आने वाले समय में राम मंदिर के लिए खतरा पैदा होगा।'
संतों की तीखी प्रतिक्रिया
हनुमानगढ़ी के पुजारी देवेशाचार्य ने कहा कि CEO व्यवस्था 'राम मंदिर की परंपरा और मर्यादा के विरोध में' होगी और जहाँ CEO होते हैं, वहाँ भ्रष्टाचार अधिक पनपता है। उन्होंने माँग की कि राम मंदिर आंदोलन में संघर्ष करने वाले और अखाड़ों से जुड़े लोगों को ट्रस्ट में शामिल किया जाए।
साकेत भवन के सीताराम दास ने CEO नियुक्ति की 'कड़ी निंदा' करते हुए कहा कि यदि यह व्यवस्था लागू हुई तो नृपेंद्र मिश्रा को अयोध्या में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा और ज़रूरत पड़ने पर आंदोलन व अनशन किया जाएगा। उन्होंने कहा, 'ऑडिट करवाओ, सही निगरानी करो — लेकिन विश्वास और श्रद्धा पर हमला बर्दाश्त नहीं।'
रामदल ट्रस्ट के अध्यक्ष कल्कि राम ने ट्रस्ट के पुनर्गठन की माँग करते हुए कहा कि स्थानीय संतों और मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों को ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए तथा मंदिर की पारदर्शिता बनाए रखी जानी चाहिए।
ट्रस्ट अध्यक्ष का पक्ष
महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत कमल नयन दास ने इस विवाद के बीच एक अलग सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कुछ लोगों ने 'रामालय' ट्रस्ट बनाकर देशभर में चंदा इकट्ठा किया था और वह पैसा कहाँ गया, यह जाँच का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए विदेशी फंडिंग चल रही है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के बारे में उन्होंने कहा कि वे 'अच्छे हैं, लेकिन उनके साथ कुछ लोगों ने कपट किया है — उनका कोई दोष नहीं।'
आगे क्या होगा
गौरतलब है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की जाँच अभी जारी है और इसी पृष्ठभूमि में ट्रस्ट के पुनर्गठन व CEO नियुक्ति की चर्चा तेज़ हुई है। संतों के व्यापक विरोध को देखते हुए यह देखना होगा कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट इस प्रस्ताव पर आगे क्या रुख अपनाता है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया जारी रही तो संत समाज ने आंदोलन और अनशन की चेतावनी दी है।