रामधारी सिंह 'दिनकर' जयंती 2026: 'याचना नहीं, अब रण होगा' — राष्ट्रकवि की रचनाएं आज भी जीवंत
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की जयंती प्रतिवर्ष 23 सितंबर को मनाई जाती है — वह दिन जब 1908 में हिंदी साहित्य के इस महान सूर्य का उदय हुआ था। उनकी कविताएं आज भी युवाओं, समाज और राष्ट्रीय चेतना में उसी ओज के साथ प्रज्ज्वलित हैं, जैसे दशकों पहले थीं। 'याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा' — यह पंक्ति केवल काव्य नहीं, बल्कि एक युग की आत्मा का उद्घोष है।
जन्म और संघर्षमय बचपन
बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में 23 सितंबर 1908 को एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे दिनकर का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। महज दो वर्ष की अवस्था में उनके पिता का निधन हो गया। विधवा माँ ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया।
स्कूल जाने के लिए गंगा पार करना, पैदल लंबी दूरियाँ तय करना और आर्थिक तंगी — यही उनके बचपन की वास्तविकता थी। गौरतलब है कि यही संघर्ष आगे चलकर उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह और आक्रोश के रूप में प्रकट हुआ।
शिक्षा और साहित्यिक यात्रा
पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिनकर ने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का भी गहन अध्ययन किया, जिसने उनके साहित्यिक दृष्टिकोण को व्यापकता दी। उनकी साहित्यिक यात्रा विद्यालय के दिनों से ही आरंभ हो गई थी।
1928 में प्रकाशित 'बारदोली-विजय' उनका पहला काव्य-संग्रह था। इसके पश्चात् 'रश्मिरथी', 'कुरुक्षेत्र' और 'उर्वशी' जैसे प्रबंध-काव्य तथा 'हुंकार', 'रेणुका', 'रसवंती' और 'द्वंद्वगीत' जैसे मुक्तक-काव्य — प्रत्येक रचना में एक विशिष्ट ताप और ऊर्जा दिखाई देती है। उन्होंने कविता के अतिरिक्त निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी और इतिहास में भी लेखन किया, जो उनकी बहुआयामी प्रतिभा का प्रमाण है।
सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रीय भूमिका
आजीविका के लिए दिनकर ने पहले अध्यापन किया, फिर बिहार सरकार में सब-रजिस्ट्रार बने। उल्लेखनीय यह है कि अंग्रेज सरकार के युद्ध-प्रचार विभाग में कार्य करते हुए भी वे उसके विरुद्ध कविताएं लिखते रहे — शब्दों का यह प्रतिरोध उन्हें औपनिवेशिक सत्ता के लिए असुविधाजनक बनाता था।
स्वतंत्रता के पश्चात् वे मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष बने और 1952 में राज्यसभा के सदस्य के रूप में संसद पहुँचे, जहाँ उन्होंने दो कार्यकाल सेवाएं दीं। बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति और तत्पश्चात् भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में दिल्ली लौटे।
सम्मान और विरासत
'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'उर्वशी' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त हुआ — हिंदी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया और उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया गया।
यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब हिंदी साहित्य की पुनर्चर्चा एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले रही है। 24 अप्रैल 1974 को दिनकर का निधन हुआ, परंतु 'वर्षों तक वन में घूम-घूम... सौभाग्य न सब दिन सोता है' जैसी पंक्तियाँ आज भी हर पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं और राष्ट्रीय चेतना का अविभाज्य हिस्सा बनी हुई हैं।