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रामविलास पासवान पुण्यतिथि: छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में मंत्री रहे 'राजनीति के मौसम वैज्ञानिक'

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रामविलास पासवान पुण्यतिथि: छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में मंत्री रहे 'राजनीति के मौसम वैज्ञानिक'

सारांश

बिहार के खगड़िया से डीएसपी की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए रामविलास पासवान ने छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में केंद्रीय मंत्री पद संभाला। लालू प्रसाद ने उन्हें 'मौसम वैज्ञानिक' कहा — 8 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर एक बहुआयामी राजनीतिक विरासत को याद करने का अवसर।

मुख्य बातें

रामविलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया में एक दलित परिवार में हुआ था।
उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी — छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया।
1977 में हाजीपुर से सबसे अधिक मतों के अंतर से जीत का रिकॉर्ड बनाया; 2009 में उसी सीट से हारे।
1983 में दलित सेना स्थापित की; बाद में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) का गठन किया।
8 अक्टूबर 2020 को निधन; 2021 में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित।
राजद के लालू प्रसाद यादव ने उन्हें 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' की उपाधि दी थी।

पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की 8 अक्टूबर 2020 को निधन की पुण्यतिथि पर उनका राजनीतिक जीवन एक बार फिर चर्चा में है — वह जीवन जो बिहार के एक दलित परिवार से शुरू होकर नई दिल्ली की सत्ता के केंद्र तक पहुँचा। भारतीय राजनीति में पासवान की विशिष्टता यह रही कि वे अलग-अलग विचारधाराओं और गठबंधनों की छह केंद्र सरकारों में मंत्री रहे — एक ऐसी उपलब्धि जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती है।

बिहार से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर

रामविलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया ज़िले में एक दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने खगड़िया के कोसी कॉलेज से कानून की पढ़ाई की और बाद में पटना विश्वविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने बिहार पुलिस में डीएसपी के पद पर भी काम किया।

1969 में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर एक आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के लिए चुने गए। यही वह पहला कदम था जिसने आने वाले दशकों में उन्हें भारतीय राजनीति का एक प्रमुख चेहरा बनाया।

हाजीपुर से राष्ट्रीय पहचान, इमरजेंसी से लोजपा तक

1974 में पासवान ने लोकदल के महासचिव की भूमिका संभाली। अगले ही वर्ष देश में आपातकाल (1975-77) लागू हुआ और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। आपातकाल हटने के बाद 1977 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर हाजीपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और सबसे अधिक मतों के अंतर से जीत का रिकॉर्ड बनाया। 1980 और 1984 में भी उन्होंने इसी सीट से जीत दर्ज की, जिससे हाजीपुर उनकी राजनीतिक पहचान का मज़बूत आधार बन गया।

1983 में पासवान ने दलित समुदाय के हितों के लिए 'दलित सेना' नाम से एक संगठन की स्थापना की, जिसे बाद में अनुसूचित जाति सेना नाम दिया गया। जनता दल से अलग होने के बाद उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की स्थापना की, जो बिहार की राजनीति में उनकी स्वतंत्र पहचान का माध्यम बनी।

छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री — एक अद्वितीय राजनीतिक यात्रा

पासवान की राजनीतिक यात्रा की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी — इन छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया। बदलती सरकारों के साथ उनकी भूमिका बदलती रही, परंतु राष्ट्रीय राजनीति में उनकी उपस्थिति अटूट बनी रही।

यही वह क्षमता थी जिस पर कटाक्ष करते हुए राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने उन्हें 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' कहा था — अर्थात् वे सत्ता की हवा का रुख पहले भाँप लेते थे।

2005 का बिहार और एक अहम राजनीतिक पड़ाव

2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा की भूमिका निर्णायक रही। उस समय राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री थीं। फरवरी-मार्च में हुए चुनाव में राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से दूर रही। लोजपा किंगमेकर की स्थिति में आ गई।

पासवान ने लालू यादव के सामने शर्त रखी कि यदि वे मुस्लिमों के वास्तविक हितैषी हैं तो किसी मुस्लिम को राज्य की कमान सौंपें — तभी लोजपा समर्थन देगी। लालू यादव ने यह प्रस्ताव नहीं माना। न राजद सरकार बना सकी, न लोजपा। अंततः पासवान ने राज्यपाल से राष्ट्रपति शासन की माँग की, जो लागू हुआ।

एकमात्र राजनीतिक चूक और विरासत

कहा जाता है कि अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पासवान एक बार राजनीतिक हवा का रुख सही नहीं भाँप सके। 2009 में उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़कर राजद के साथ गठबंधन किया और परिणामस्वरूप अपनी पारंपरिक हाजीपुर सीट से चुनाव हार गए — वही सीट जहाँ से वे रिकॉर्ड मतों से जीत चुके थे। हालाँकि, 2010 में राजद और कांग्रेस के समर्थन से वे राज्यसभा के रास्ते संसद पहुँचे।

8 अक्टूबर 2020 को उनका निधन हुआ। उनकी स्मृति में 2021 में उन्हें मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। दलित राजनीति, सामाजिक न्याय और गठबंधन की राजनीति में उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह राजनीतिक उत्तरजीविता की एक अद्भुत कला मात्र थी। 2005 बिहार प्रकरण बताता है कि वे केवल सत्ता के साथ नहीं बहे — उन्होंने कभी-कभी सत्ता को चुनौती देने का जोखिम भी उठाया, भले ही परिणाम उनके पक्ष में न रहा हो।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रामविलास पासवान कौन थे और उनकी पुण्यतिथि कब है?
रामविलास पासवान भारत के वरिष्ठ दलित नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री थे, जिनका निधन 8 अक्टूबर 2020 को हुआ था। वे लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक थे और छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे।
रामविलास पासवान को 'मौसम वैज्ञानिक' क्यों कहा जाता था?
राजद के लालू प्रसाद यादव ने उन्हें 'राजनीति का मौसम वैज्ञानिक' कहा था, क्योंकि पासवान केंद्र में किसी भी दल या गठबंधन की सरकार हो, उसमें जगह बना ही लेते थे। उनकी यह क्षमता उन्हें बदलते राजनीतिक समीकरणों का कुशल पाठक साबित करती थी।
रामविलास पासवान ने किन छह प्रधानमंत्रियों की सरकार में काम किया?
उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी — इन छह प्रधानमंत्रियों की सरकारों में केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया।
लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना कब और क्यों हुई?
रामविलास पासवान ने जनता दल से अलग होने के बाद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की स्थापना की, ताकि बिहार और राष्ट्रीय राजनीति में दलित व वंचित समुदायों के लिए एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच तैयार हो सके। इससे पहले 1983 में वे 'दलित सेना' नाम से संगठन भी बना चुके थे।
रामविलास पासवान को पद्म भूषण कब मिला?
रामविलास पासवान को 2021 में मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके दीर्घकालिक राजनीतिक योगदान और दलित समुदाय के लिए किए गए कार्यों की स्वीकृति थी।
राष्ट्र प्रेस
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