तमिलनाडु में पोन्नी चावल ₹78/किलो पर, धान की कमी से एक महीने में कीमतें तीन बार बढ़ीं
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में धान उत्पादन में गिरावट और पड़ोसी राज्यों से आपूर्ति घटने के कारण पिछले एक महीने में चावल की प्रमुख किस्मों की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। सबसे अधिक असर पोन्नी चावल पर पड़ा है — जो तमिलनाडु के अधिकांश परिवारों का मुख्य अनाज है — और बाज़ार में यह अब ₹78 प्रति किलोग्राम पर बिक रहा है। व्यापारियों के अनुसार, बीते 50 दिनों में चावल की कीमतों में तीन बार संशोधन हो चुका है।
कीमतों में कितना उछाल आया
बाज़ार आंकड़ों के अनुसार, पोन्नी चावल की खुदरा कीमत ₹65 प्रति किलोग्राम से बढ़कर ₹78 प्रति किलोग्राम हो गई है। मन्नाचनल्लूर पोन्नी ₹60 से ₹68 प्रति किलोग्राम पर पहुँच गया है, जबकि प्रीमियम पोन्नी की कीमत ₹65 से छलांग लगाकर ₹82 प्रति किलोग्राम तक जा पहुँची है।
आईआर-20 चावल का दाम भी ₹50 से बढ़कर ₹60 प्रति किलोग्राम हो गया है। सामान्य कच्चे चावल (रॉ राइस) की कीमत ₹45 से उठकर कई दुकानों में ₹68 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई है। थोक बाज़ार में फाइन पोन्नी चावल फिलहाल करीब ₹75 प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रहा है।
संकट की जड़ें: कावेरी डेल्टा से पड़ोसी राज्यों तक
कावेरी डेल्टा क्षेत्र में इस मौसम कम बारिश हुई और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिला, जिससे धान की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई। यह ऐसे समय में आया है जब आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में भी धान की पैदावार घटी है — तीनों राज्य तमिलनाडु की राइस मिलों के लिए प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
राइस मिल मालिकों के अनुसार, दूसरे राज्यों से आने वाले धान की खरीद कीमत पिछले सीजन के ₹32 प्रति किलोग्राम से बढ़कर करीब ₹44 प्रति किलोग्राम हो गई है। उनका मानना है कि अप्रैल की कमज़ोर कुरुवई फसल के कारण धान की आवक में उल्लेखनीय कमी आई है।
आगे कीमतें और बढ़ेंगी या घटेंगी
व्यापारियों का कहना है कि यदि पड़ोसी राज्यों से आपूर्ति कम बनी रही और कुरुवई धान की अगली फसल कमज़ोर रही, तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है। खुदरा व्यापारी अभी भी कीमतों में और वृद्धि की आशंका जता रहे हैं।
दूसरी ओर, राइस मिल मालिकों को उम्मीद है कि आने वाले महीनों में नई फसल की आवक बढ़ने से धान की आपूर्ति में सुधार होगा और बाज़ार में स्थिरता लौटेगी। गौरतलब है कि तमिलनाडु में पोन्नी चावल की खपत अधिक है, लेकिन राज्य में इसकी खेती तुलनात्मक रूप से सीमित है, जिस कारण पड़ोसी राज्यों की फसल का सीधा असर इसकी कीमतों पर पड़ता है।
दीर्घकालिक हल की माँग
बढ़ती कीमतों के बीच व्यापारियों और कृषि विशेषज्ञों ने राज्य में उपभोक्ताओं की पसंदीदा महीन धान की किस्मों की खेती का क्षेत्रफल बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। उनका तर्क है कि स्थानीय उत्पादन में विस्तार किए बिना तमिलनाडु की खाद्य सुरक्षा पड़ोसी राज्यों के मौसम और फसल उत्पादन पर निर्भर बनी रहेगी।