मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में बड़ा बयान: आरएसएस धर्म देखकर नहीं, सबकी सेवा करता है
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित 'एक दुनिया, एक मानवता' शीर्षक धार्मिक नेताओं की सभा को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि आरएसएस अपनी सेवा-गतिविधियों में किसी भी प्रकार का धार्मिक भेदभाव नहीं करता। उन्होंने 1996 में हरियाणा के चरखी दादरी में हुई भीषण विमान दुर्घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि स्वयंसेवकों ने वहाँ मुस्लिम यात्रियों की बिना किसी हिचकिचाहट के सेवा की।
सभा में क्या बोले भागवत
भागवत ने धार्मिक नेताओं की इस अंतरराष्ट्रीय सभा में कहा कि समुदायों के बीच केवल संवाद पर्याप्त नहीं है — सेवा और संवाद को साथ-साथ चलना चाहिए। उनके शब्दों में, 'बातचीत पहला कदम है। सेवा दूसरा कदम है। ऐसा नहीं है कि एक के बाद दूसरा कदम उठाया जाए। ये दोनों काम एक साथ शुरू होने चाहिए।'
उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस की स्थापना के समय से ही सेवा उसके मूल कार्यों में शामिल रही है और स्वयंसेवक मदद माँगने वाले व्यक्ति की धार्मिक पहचान कभी नहीं पूछते।
चरखी दादरी विमान दुर्घटना का संदर्भ
12 नवंबर 1996 को हरियाणा के चरखी दादरी के निकट हवा में सऊदी अरब एयरलाइंस और कजाकिस्तान एयरलाइंस के दो विमान आपस में टकरा गए थे। विमानन इतिहास की सबसे घातक हवाई टक्करों में से एक इस दुर्घटना में दोनों विमानों में सवार सभी 349 लोगों की मौत हो गई थी। दोनों विमान अरब देशों से संबंधित थे और अधिकांश यात्री मुसलमान थे।
भागवत ने बताया कि आरएसएस के स्वयंसेवक घटनास्थल पर पहुँचे और उन्होंने बचे हुए लोगों का उपचार किया, शवों को बाहर निकाला, अंतिम संस्कार की व्यवस्था में सहयोग किया और पीड़ितों की पहचान में उनके परिजनों की मदद की। उन्होंने कहा, 'उस समय हमने कभी नहीं सोचा कि ये मुसलमान हैं। हम ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि हम राजनीति में नहीं हैं। हम सिर्फ देते हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए।'
आरएसएस की सेवा का विस्तार
भागवत के अनुसार, समाज के सहयोग से आरएसएस के स्वयंसेवक वर्तमान में विभिन्न स्तरों पर 1,30,000 सेवा कार्य संचालित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सेवा का प्रभाव द्विदिशीय होता है — लाभार्थी स्वयं भी प्रेरित होकर दूसरों की मदद के लिए आगे आते हैं।
उन्होंने लाभार्थियों की भावना को उद्धृत करते हुए कहा, 'इस प्रोजेक्ट ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मुझे भी कुछ वापस देना है।' भागवत ने स्पष्ट किया कि यह भावना स्वयंसेवकों द्वारा प्रेरित नहीं की जाती, बल्कि अपने आप उत्पन्न होती है।
आरएसएस की छवि पर भागवत का स्पष्टीकरण
भागवत ने स्वीकार किया कि संगठन के बारे में समाज में कुछ गलतफहमियाँ हैं, जिसकी एक बड़ी वजह यह है कि आरएसएस ने अपने कार्यों का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया। उन्होंने कहा, 'इसीलिए प्रचार-प्रसार के मामले में हम काफी पीछे हैं। गलत बातों और धारणाओं की वजह से कई तरह की गलतफहमियाँ पैदा हो गई हैं। लेकिन जब आप आकर हमें अंदर से देखेंगे, तो वे सारी गलतफहमियाँ एक ही दिन में दूर हो जाएंगी।'
उन्होंने उपस्थित धार्मिक नेताओं से आग्रह किया कि वे अपने-अपने देशों में निस्वार्थ सेवा के ऐसे ही उदाहरण प्रस्तुत करें और निरंतर संवाद के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहें।
आरएसएस की पृष्ठभूमि
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में के.बी. हेडगेवार ने की थी। 2025 में संगठन ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए। देशभर में फैले स्वयंसेवकों के विशाल नेटवर्क के अलावा, आरएसएस से जुड़े अनुषांगिक संगठन शिक्षा, समाज सेवा, श्रमिक और आदिवासी कल्याण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं। भागवत का यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर अंतर-धार्मिक सहयोग और संवाद की माँग तेज हो रही है।