सांगली: नाबालिग से छेड़छाड़ पर कोर्ट का फैसला — जगदीश चव्हाण को 4 साल जेल, ₹50,000 जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के सांगली जिले के जत थाना क्षेत्र में नाबालिग से छेड़छाड़ के एक गंभीर मामले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश जे. ए. मोहिते ने आरोपी जगदीश चव्हाण (25 वर्षीय, डफलापुर निवासी) को 4 वर्ष के कारावास और ₹50,000 के जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने यह फैसला पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर सुनाया, जिसने अकेले अपने बयान से मामले को साबित किया।
मुख्य घटनाक्रम
जत थाने में दर्ज एफआईआर के अनुसार, आरोपी जगदीश चव्हाण पीड़िता के घर के निकट ही रहता था। उसने पहले बच्ची से दोस्ती कर उसका विश्वास जीता और फिर खेलते समय 'बाजू वाला घर दिखाता हूँ' कहकर उसे अपने घर ले गया, जहाँ उसने छेड़छाड़ की।
पीड़िता किसी तरह चिल्लाते हुए वहाँ से भागी और सीधे अपने परिजनों को पूरी घटना बताई। उसने आरोपी की पहचान भी कराई। इसके बाद पीड़िता के माता-पिता ने जत पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।
जाँच और आरोप पत्र
मामले की जाँच पुलिस उप निरीक्षक महेश गायकवाड ने की। उन्होंने गहन जाँच के बाद अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। जत पुलिस ने आरोपी के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 354 के तहत मामला दर्ज किया था।
सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी अभियोक्ता व्ही. के. मुरचिटे, ए. एम. साटविलकर और एस. आर. हिंगमिरे ने मामला पैरवी की। उनकी दलीलों को अदालत ने स्वीकार किया।
पीड़िता की गवाही निर्णायक रही
सुनवाई के दौरान मामले के अन्य गवाह कथित तौर पर दबाव में आकर अपने बयान से मुकर गए। हालाँकि, पीड़िता ने अदालत में पूरी घटना का विवरण बेहद स्पष्ट और विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत किया, जो मामले में निर्णायक साबित हुई।
गौरतलब है कि बाल यौन अपराध मामलों में पीड़ित की गवाही को कानूनी रूप से विशेष महत्व दिया जाता है, और इस मामले में अदालत ने उसी आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया।
सजा का विवरण
जिला एवं सत्र न्यायाधीश जे. ए. मोहिते ने आरोपी जगदीश चव्हाण को निम्नलिखित सजाएँ सुनाईं:
बीएनएस धारा 354 के तहत 4 वर्ष कारावास; पॉक्सो धारा 8 के तहत 4 वर्ष कारावास; पॉक्सो धारा 12 के तहत 3 वर्ष कारावास; और ₹50,000 का जुर्माना। यह मामला बाल सुरक्षा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का एक उदाहरण माना जा रहा है।
आगे की स्थिति
यह फैसला महाराष्ट्र में पॉक्सो मामलों की सुनवाई की गति और न्यायिक प्रक्रिया की मजबूती को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले बाल अपराधों पर अंकुश लगाने में सहायक होते हैं और पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया में भरोसा बढ़ाते हैं।