मोहन भागवत के बयान पर संजय निषाद का समर्थन, कांग्रेस बोली — 'इतने डरे हुए क्यों हैं?'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयान ने राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। भागवत ने कहा था कि भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसी घटनाएँ संभव नहीं हैं और इस प्रकार के सत्ता परिवर्तन स्वार्थ से प्रेरित होते हैं। उनके इस बयान पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की ओर से खुलकर प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
संजय निषाद का समर्थन
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री संजय निषाद ने भागवत के बयान का खुलकर समर्थन किया। निषाद ने कहा, 'मैं उनकी बातों से सहमत हूँ। यहाँ कुछ विदेशी ताकतें हैं, जो भारत को अस्थिर करना चाहती हैं। जनता के बीच जाएँ और बताएँ कि क्या सही है और क्या गलत।'
उन्होंने आगे कहा, 'जनता तय करे कि कौन सही है और कौन गलत। उसी आधार पर चुनाव हो और बदलाव हो। लेकिन ये लोग जनता के बीच डर के मारे नहीं जाएँगे, क्योंकि जनता ने फैसला सुना दिया है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी जनता द्वारा चुने गए हैं, इसलिए उन्हें ही सत्ता में रहने दो।'
कांग्रेस की तीखी प्रतिक्रिया
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भागवत के बयान पर पलटवार करते हुए कहा, 'आप इतने डरे हुए क्यों हैं? हम इस तरह से सत्ता परिवर्तन नहीं करेंगे। हम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास रखते हैं।' मसूद ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष बना रहना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया, 'आप लोकतंत्र को कमज़ोर करके सत्ता में बैठे हैं और इसीलिए डरे हुए हैं। हम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में यकीन रखते हैं और चाहते हैं कि इस व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे।'
मुंबई से दलवई का तीखा हमला
मुंबई में कांग्रेस नेता हुसैन दलवई ने भी भागवत की भाषा पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, 'कोई भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं करता। यहाँ चल रहा पूरा आंदोलन महात्मा गांधी के रास्ते पर चला है। जब बच्चों के साथ अन्याय होता है, पुलिस उन्हें पीटती है — तब भी कोई हिंसा का सहारा नहीं लेता। यह गांधी का देश है। मोहन भागवत को यह बात समझनी चाहिए।'
दलवई ने आगे कहा, 'आप एक चरमपंथी संगठन चला रहे हैं — पहले अपने संगठन को ठीक कर लीजिए। गांधी की विचारधारा में विश्वास रखिए, तिरंगे में विश्वास रखिए और संविधान में विश्वास रखिए।'
राजनीतिक संदर्भ
यह ऐसे समय में आया है जब नेपाल और बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में भारत की आंतरिक राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप को लेकर बहस तेज़ है। गौरतलब है कि RSS प्रमुख का यह बयान किसी सरकारी मंच से नहीं, बल्कि संगठनात्मक मंच पर दिया गया — फिर भी इसने सत्ता-विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक को जन्म दिया है।
आगे देखना होगा कि विपक्षी दल इस बयान को अपने राजनीतिक अभियान में किस रूप में इस्तेमाल करते हैं और क्या RSS की ओर से कोई स्पष्टीकरण आता है।