भदोही का नया नाम 'संत रविदास नगर भदोही': CM योगी का दलित-राजभर समाज को दोहरा सियासी संदेश
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम 'संत रविदास नगर भदोही' किए जाने की घोषणा को 4 अक्टूबर 2026 को भदोही की धरती से एक बार फिर दोहराया। इस नामकरण में उन्होंने दलित आस्था के प्रतीक संत रविदास और भार राज से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान — दोनों को एक साथ समेटा है। पूर्वांचल के सामाजिक समीकरण में निर्णायक भूमिका निभाने वाले दलित और राजभर समाज के नज़रिए से यह कदम गहरे राजनीतिक अर्थ रखता है।
नाम बदलने का ताज़ा संदर्भ
मुख्यमंत्री योगी ने सबसे पहले 29 जुलाई 2026 को वाराणसी में इस नाम परिवर्तन की घोषणा की थी। रविवार को वे ₹1,340 करोड़ से अधिक की 112 परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास कार्यक्रम में भदोही पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने स्पष्ट किया कि जनपद को 'संत रविदास नगर भदोही' के नाम से जाना जाएगा। अपने संबोधन में उन्होंने संत रविदास के उस संदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें बिना भेदभाव सभी को अन्न और सम्मान मिलने की कल्पना की गई है — जिसे उन्होंने केंद्र और प्रदेश सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा।
तीन दशकों में चार बार बदली जिले की पहचान
इस नामकरण की कहानी करीब तीन दशक पुरानी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 30 जून 1994 को वाराणसी से अलग कर भदोही को नया जनपद बनाया। इसके तीन वर्ष बाद 4 दिसंबर 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने संत शिरोमणि गुरु रविदास के सम्मान में जिले का नाम 'संत रविदास नगर' करने का नोटिफिकेशन जारी किया।
करीब 17 साल बाद 6 दिसंबर 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कैबिनेट बैठक के माध्यम से 'संत रविदास नगर' का नाम बदलकर पुनः 'भदोही' कर दिया। अब योगी आदित्यनाथ ने दोनों नामों को एक साथ जोड़कर 'संत रविदास नगर भदोही' की संयुक्त पहचान सामने रखी है — यह इस जिले की नामकरण श्रृंखला की चौथी अहम कड़ी है।
भदोही का इतिहास: भार राज से ब्रिटिश काल तक
जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार भदोही नाम की उत्पत्ति यहाँ के प्राचीन 'भार राज्य' से हुई, जिसने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया था। क्षेत्र में भार शासकों से जुड़े पुराने टीले और तालाब आज भी इस विरासत के साक्षी बताए जाते हैं।
अकबर के शासनकाल में भदोही को 'दस्तुर' बनाकर इलाहाबाद (प्रयागराज) सरकार में शामिल किया गया और बाद में यह क्षेत्र अलग-अलग शासकों के अधीन रहा। 1911 में यह बनारस रियासत का हिस्सा बना और स्वतंत्रता के बाद वाराणसी जिले में समाहित रहा — जब तक 1994 में इसे अलग जनपद नहीं बना दिया गया।
दलित और राजभर समाज पर सियासी असर
संत रविदास दलित समाज के प्रमुख आराध्य और सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। उनका नाम जिले की पहचान में पुनः स्थापित होना दलित समाज के लिए सम्मान और आस्था के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। वहीं 'भदोही' नाम का बना रहना राजभर समाज की सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत को भी मान्यता देता है।
गौरतलब है कि पूर्वांचल की सियासत में दलित और राजभर समाज दोनों ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस संयुक्त नामकरण को भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उस व्यापक रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जो पिछड़े और दलित वर्गों के बीच समावेशी पहचान की राजनीति को केंद्र में रखती है।
आगे क्या होगा
नाम बदलने की औपचारिक अधिसूचना और प्रशासनिक प्रक्रिया अभी जारी बताई जा रही है। यह देखना अहम होगा कि इस दोहरे नामकरण को राज्य सरकार कितनी शीघ्रता से सरकारी रिकॉर्ड, साइनबोर्ड और दस्तावेज़ों में लागू करती है। पूर्वांचल के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव आने वाले चुनावी समर में और स्पष्ट होंगे।