केरल विधानसभा के पहले सत्र में CM सतीशन का दबदबा, पिनाराई विजयन का विपक्ष बेअसर
सारांश
मुख्य बातें
मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने केरल विधानसभा के नई सरकार के पहले सत्र में अप्रत्याशित राजनीतिक बढ़त हासिल की, जबकि विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन — जो एक दशक तक सदन पर हावी रहे — इस बार विपक्ष की बेंचों से कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं डाल सके। 4 जुलाई को समाप्त हुए इस सत्र ने तिरुवनंतपुरम की राजनीतिक गलियारों में व्यापक चर्चा छेड़ दी है।
भूमिकाओं का उलटफेर
लगभग दस वर्षों तक पिनाराई विजयन ने मुख्यमंत्री के रूप में विधानसभा की कार्यवाही पर अपनी पकड़ बनाए रखी। न तो रमेश चेन्निथला के नेतृत्व वाला विपक्ष और न ही बाद में सतीशन के नेतृत्व वाला विपक्ष उन्हें लगातार चुनौती दे पाया। परंतु भूमिकाओं के इस बदलाव ने समीकरण पलट दिए।
82 वर्षीय अनुभवी नेता विजयन ने विपक्ष के नेता के रूप में अपने पहले ही सत्र में पाया कि उनके कई हस्तक्षेप बेअसर रहे और विपक्ष की कई रणनीतियाँ उलटी पड़ गईं।
सतीशन की विधायी पकड़
गौरतलब है कि सतीशन ने मुख्यमंत्री पद संभालने से पहले कभी मंत्री पद पर काम नहीं किया, फिर भी 25 से अधिक वर्षों की विधानसभा सेवा ने उन्हें विधायी प्रक्रिया और राजनीतिक रणनीति की गहरी समझ दी। उन्होंने बार-बार विपक्षी हमलों को वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को रक्षात्मक स्थिति में लाने के अवसर में बदला।
LDF की आंतरिक अव्यवस्था
विपक्ष की मुश्किलें केवल बाहरी नहीं थीं — LDF के भीतर आंतरिक विभाजन ने स्थिति और जटिल बना दी। विपक्ष के उपनेता पद को लेकर सीपीआई (एम) और सीपीआई के बीच अनसुलझे विवाद के कारण विधानसभा सत्र के दौरान LDF विधायक दल की बैठकें तक नहीं हो सकीं। समन्वय की इस कमी के चलते विपक्ष के पास कोई सुसंगत राजनीतिक रणनीति नहीं रही।
विपक्ष की शर्मिंदगी के क्षण
सीपीआई नेता के. राजन द्वारा कीचड़ भरे पानी की बोतल दिखाकर सरकार को घेरने का प्रयास तब उलटा पड़ गया जब यह सामने आया कि नमूना सड़क किनारे के एक गड्ढे से लिया गया था — न कि किसी सार्वजनिक जलापूर्ति स्रोत से। यह घटना राजनीतिक हथियार बनने के बजाय विपक्ष के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गई।
कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों पर कर रियायतों से जुड़े वित्त विधेयक पर बहस में भी विपक्ष को झटका लगा। विपक्ष ने सरकार पर यह प्रावधान चुपके से शामिल करने का आरोप लगाया, लेकिन सत्ता पक्ष ने यह कहकर पलटवार किया कि व्यापार सलाहकार समिति — जिसमें स्वयं पिनाराई विजयन और के. राजन शामिल थे — ने ही विधेयक को विषय समिति के पास भेजे बिना सीधे विचार के लिए मंजूरी दी थी।
सतीशन का सबसे प्रभावी खंडन
इसके बाद सतीशन ने सत्र का सबसे धारदार जवाब देते हुए सदन को याद दिलाया कि पूर्व वित्त मंत्री केएन बालागोपाल के नेतृत्व वाली पिछली LDF सरकार ने भी इसी तरह का विधायी मार्ग अपनाया था। इस तर्क ने विपक्ष के आरोप को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी कर दिया।
विपक्ष के वरिष्ठ नेता निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि अपर्याप्त तैयारी, रणनीतिक चूक और आंतरिक विभाजन के कारण सरकार को घेरने के अवसर बार-बार हाथ से निकल गए। आने वाले सत्रों में LDF किस तरह अपनी विपक्षी भूमिका को धार देता है, यह केरल की राजनीति की दिशा तय करेगा।