तेलंगाना: वोटर लिस्ट से 73.3 लाख नाम हटाए, टीपीसीसी अध्यक्ष महेश कुमार गौड़ ने चुनाव आयोग पर साधा निशाना
सारांश
मुख्य बातें
तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (टीपीसीसी) के अध्यक्ष महेश कुमार गौड़ ने मंगलवार, 18 अगस्त को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के अंतर्गत प्रारूप मतदाता सूची से 73 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर चुनाव आयोग की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई मनमाने तरीके से की गई है और इससे गरीब तथा प्रवासी मजदूर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ है।
मुख्य घटनाक्रम
चुनाव आयोग ने सोमवार, 17 अगस्त को तेलंगाना की प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित की। इसमें 73.3 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट श्रेणी में वर्गीकृत किया गया था। इसके अतिरिक्त, 92.8 लाख मतदाताओं को भी चिह्नित किया गया है, जिनके गणना विवरण में विसंगतियाँ पाई गई हैं या जिनका रिकॉर्ड पूरी तरह मैप नहीं हो सका है।
आंकड़ों के अनुसार, सूची से हटाए गए 73.3 लाख मतदाताओं में से करीब 43 लाख हैदराबाद तथा उससे सटे रंगारेड्डी और मेडचल-मलकाजगिरी जिलों के हैं।
महेश कुमार गौड़ के आरोप
टीपीसीसी अध्यक्ष ने सवाल किया, 'आपको इस देश में जन्मे नागरिकों के वोट हटाने का अधिकार किसने दिया?' उन्होंने यह भी पूछा कि अलग-अलग श्रेणियों में रखे गए अन्य 92 लाख लोग अभी भी मतदाता सूची में क्यों बने हुए हैं।
गौड़ ने दावा किया कि 2014 से केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की तरह चुनाव आयोग भी BJP का सहयोगी संगठन बन गया है — हालाँकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
दस्तावेज़ों की माँग पर विवाद
गौड़ ने कहा कि परिसीमन और मतदान केंद्रों में बदलाव के कारण कई परिवारों के पास वर्ष 2002 के एसआईआर से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। उनका तर्क है कि जो नागरिक भारत में जन्मे हैं और कई बार मतदान कर चुके हैं, उनसे दो दशक पुराने दस्तावेज माँगना अव्यावहारिक है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) ने घर-घर जाकर गणना फॉर्म वितरित नहीं किए, जिससे बड़ी संख्या में पात्र मतदाता प्रक्रिया से बाहर हो गए।
कांग्रेस की माँगें
टीपीसीसी अध्यक्ष ने चुनाव आयोग से माँग की कि एसआईआर की समय सीमा बढ़ाई जाए ताकि सभी मामलों की गहन जाँच हो सके। उन्होंने यह भी माँग की कि 2002 के एसआईआर का विवरण हो या न हो, प्रत्येक पात्र मतदाता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए और उनके मतदान अधिकार की रक्षा की जाए।
आम जनता पर असर
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब तेलंगाना में अगले विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ पृष्ठभूमि में चल रही हैं। आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं का नाम हटाना — विशेष रूप से शहरी और प्रवासी श्रमिक वर्ग में — लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है। गौरतलब है कि हैदराबाद जैसे महानगरीय क्षेत्रों में प्रवासी आबादी की संख्या काफी अधिक है, जो अक्सर स्थायी पते के अभाव में मतदाता सूची से बाहर हो जाती है।