'सतलुज' विवाद पर रवनीत सिंह बिट्टू: आपत्ति धर्म से नहीं, आतंकवाद से है
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने 13 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म 'सतलुज' पर उनकी आपत्ति किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि आतंकवाद, हिंसा और रक्तपात के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि सिख धर्म 'शांति, साहस, त्याग और मानवता की सेवा' का प्रतीक है और उसे किसी भी रूप में उग्रवाद से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
सिख समुदाय के योगदान पर जोर
बिट्टू ने न्यायपालिका, सशस्त्र बलों, लोक प्रशासन, व्यापार, खेल, साहित्य और विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में सिख समुदाय के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र सेवा और वैश्विक ख्याति प्राप्त करने वाले प्रतिष्ठित सिख व्यक्तित्व सिख धर्म के सच्चे मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसके साथ ही उन्होंने पंजाब में उग्रवाद के दौरान हुई हिंसा का जिक्र करते हुए कहा कि आतंकवाद के कारण हजारों निर्दोष नागरिकों, बस यात्रियों, पुलिसकर्मियों और सरकारी कर्मचारियों की जान गई। उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद को सिख धर्म के समकक्ष नहीं माना जाना चाहिए।
फिल्म 'सतलुज' पर उठाए सवाल
फिल्म के संदर्भ में बिट्टू ने चिंता जताई कि ऐतिहासिक घटनाओं को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने फिल्म में उल्लिखित 25,000 कथित लापता शवों के आंकड़े के स्रोत पर सवाल उठाया और कुछ ऐतिहासिक हस्तियों व घटनाओं के चित्रण पर भी आपत्ति जताई।
उन्होंने मीडिया के समक्ष उन सिख व्यक्तित्वों की तस्वीरें भी प्रस्तुत कीं जिन्हें वे अपने और पूरी दुनिया के लिए आदर्श मानते हैं।
खालरा मामले पर बिट्टू का रुख
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की पत्नी परमजीत कौर खालरा द्वारा अपने पति से जुड़े मामलों की जांच के लिए 'जांच आयोग' गठित करने की मांग पर बिट्टू ने कहा कि वे निर्दोष नागरिकों, बस यात्रियों, पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों की हत्याओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि सभी तथ्यों की उचित प्रक्रिया के माध्यम से जांच होनी चाहिए और एक विश्वसनीय संस्थागत तंत्र के जरिए सच्चाई सामने आनी चाहिए।
बिट्टू ने यह भी बताया कि 1992 से 1995 के बीच खालरा ने अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया और उनके विरुद्ध कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। उन्होंने परमजीत कौर खालरा से मिलने की इच्छा भी जताई।
व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिकरण का विरोध
बिट्टू ने अपने निजी अनुभव को साझा करते हुए बताया कि उनके दादा, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, की 31 अगस्त 1995 को हत्या कर दी गई थी। उन्होंने सितंबर 1995 में खालरा के लापता होने का भी उल्लेख किया और कहा कि उस दौर की हिंसा ने दोनों परिवारों को गहरी पीड़ा दी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पीड़ितों की पीड़ा का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय में आया है जब फिल्म 'सतलुज' को लेकर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है।