13 जुलाई 2026
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यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा मजबूत, हर्षवर्धन श्रृंगला बोले — 'भारत है ग्लोबल ब्रिज'

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यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा मजबूत, हर्षवर्धन श्रृंगला बोले — 'भारत है ग्लोबल ब्रिज'

सारांश

पूर्व विदेश सचिव और राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा कि जी-7, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ में एक साथ भूमिका निभाने वाला भारत यूएनएससी का स्वाभाविक स्थायी सदस्य है। 2011-12 और 2021-22 के बाद अब 2028-29 की दावेदारी — यह महज़ चुनाव नहीं, स्थायी सीट की रणनीतिक तैयारी है।

मुख्य बातें

राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला ने 13 जुलाई 2026 को कहा कि यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा आज सबसे मजबूत स्थिति में है।
भारत 2011-12 और 2021-22 में यूएनएससी का अस्थायी सदस्य रह चुका है; अब 2028-29 कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ेगा।
प्रधानमंत्री मोदी की जी-7 और ब्रिक्स में नियमित भागीदारी भारत की वैश्विक प्रासंगिकता का प्रमाण — श्रृंगला।
यूएनएससी का चैप्टर-7 के तहत पारित प्रस्ताव सभी सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है — इसीलिए परिषद में भारत की उपस्थिति नीतिगत दृष्टि से अनिवार्य।
श्रृंगला के अनुसार अस्थायी सदस्यता स्थायी सीट की दावेदारी को मजबूत करती है और यूएनएससी सुधार की माँग को आगे बढ़ाने का मंच देती है।

राज्यसभा सांसद और पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने 13 जुलाई 2026 को कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा आज पहले से कहीं अधिक ठोस आधार पर खड़ा है। उनके अनुसार, भारत उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के देशों के बीच एक विश्वसनीय सेतु की भूमिका निभा रहा है, जो उसे वैश्विक कूटनीति में अपरिहार्य बनाता है।

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख

श्रृंगला ने कहा कि भारत की पहचान अब केवल अपने क्षेत्र तक सीमित नहीं रही — वह एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा है। उन्होंने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जी-7 और ब्रिक्स जैसे प्रभावशाली बहुपक्षीय मंचों पर नियमित रूप से आमंत्रित किया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि बड़े राष्ट्र भारत को एक अनिवार्य भागीदार के रूप में देखते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत के पश्चिमी देशों के साथ सुदृढ़ संबंध हैं, साथ ही वह ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनकर भी सामने आता है। यह दोहरी भूमिका भारत को उन देशों से अलग करती है जो किसी एक खेमे में बँधे हैं।

यूएनएससी सदस्यता का रिकॉर्ड और 2028-29 की तैयारी

श्रृंगला ने भारत के यूएनएससी अस्थायी सदस्यता के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत 2011-12 और 2021-22 में परिषद का सदस्य रह चुका है। अब भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए फिर से चुनाव लड़ने की तैयारी में है। उन्होंने कहा कि एशिया एक विशाल क्षेत्र है, इसलिए सीट कई देशों में बाँटनी पड़ती है, फिर भी भारत ने नियमित अंतराल पर परिषद में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित की है।

उनके अनुसार इस नियमित सदस्यता के दो बड़े लाभ हैं — पहला, वैश्विक मंच पर भारत की प्रासंगिकता बनी रहती है; दूसरा, भारत शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान के अपने मूल्यों को उस मंच पर प्रस्तुत कर पाता है जो अंतरराष्ट्रीय शांति-सुरक्षा का सर्वोच्च निकाय माना जाता है।

यूएनएससी की कानूनी बाध्यता और भारत की भूमिका

श्रृंगला ने यह भी स्पष्ट किया कि यूएनएससी संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र ऐसा निकाय है जिसके निर्णय सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। विशेषकर चैप्टर-7 के अंतर्गत पारित प्रस्ताव सभी सदस्य राष्ट्रों पर लागू होते हैं। इसी कारण परिषद में भारत की मौजूदगी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि नीतिगत दृष्टि से भी निर्णायक महत्व रखती है।

उन्होंने उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व और अन्य अंतरराष्ट्रीय विवादों में लगातार बातचीत और कूटनीतिक हल की पैरवी की है। ऐसे में भारत का यूएनएससी में सक्रिय रहना उसकी विदेश नीति की स्वाभाविक परिणति है।

स्थायी सदस्यता की दावेदारी और सुधार की माँग

श्रृंगला ने कहा, 'सुरक्षा परिषद की सदस्यता भारत के इस दावे को और मजबूत करती है कि उसे परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही, परिषद का सदस्य होने से भारत को सुरक्षा परिषद में सुधार की माँग को आगे बढ़ाने का भी बेहतर मौका मिलता है।' गौरतलब है कि यूएनएससी में सुधार की बहस दशकों से चल रही है और भारत, जर्मनी, जापान व ब्राज़ील — जिन्हें 'जी-4' कहा जाता है — स्थायी सीट के प्रमुख दावेदार माने जाते हैं।

आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे यूएनएससी सुधार की बहस तेज़ होगी, भारत की कूटनीतिक सक्रियता और अस्थायी सदस्यता का यह रिकॉर्ड उसके पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क बनकर उभरेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि अस्थायी सदस्यता का यह चक्र स्थायी सीट की राह कब और कैसे खोलेगा — जबकि चीन का वीटो इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। भारत की 'ग्लोबल ब्रिज' वाली भूमिका प्रभावशाली है, पर यूएनएससी सुधार के लिए P5 की सहमति ज़रूरी है, जो अभी तक नहीं बनी। गौरतलब है कि जी-4 देशों की स्थायी सीट की माँग दशकों पुरानी है और हर बार राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ठंडे बस्ते में चली जाती है। बिना किसी ठोस सुधार प्रस्ताव या समयसीमा के, यह बयान उत्साहवर्धक तो है — पर स्थायी बदलाव की गारंटी नहीं।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का दावा क्यों मजबूत माना जा रहा है?
राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला के अनुसार, भारत की जी-7, ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ में एक साथ सक्रिय भूमिका, तथा 2011-12 और 2021-22 में अस्थायी सदस्यता का सफल रिकॉर्ड, उसे यूएनएससी की स्थायी सीट का स्वाभाविक दावेदार बनाता है। भारत उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के देशों के बीच एक विश्वसनीय कूटनीतिक सेतु की भूमिका निभाता है।
भारत यूएनएससी का अस्थायी सदस्य कब-कब रहा है और अगली बार कब बनेगा?
भारत 2011-12 और 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। श्रृंगला के अनुसार, भारत अब 2028-29 के कार्यकाल के लिए फिर से चुनाव लड़ेगा।
यूएनएससी का चैप्टर-7 क्या है और भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?
चैप्टर-7 के तहत यूएनएससी द्वारा पारित प्रस्ताव सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। श्रृंगला ने कहा कि इसीलिए परिषद में भारत की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि नीतिगत दृष्टि से भी निर्णायक महत्व रखती है।
अस्थायी सदस्यता से स्थायी सदस्यता की दावेदारी को कैसे फायदा होता है?
श्रृंगला के अनुसार, परिषद का अस्थायी सदस्य होने से भारत को दो लाभ मिलते हैं — पहला, वैश्विक मंच पर उसकी प्रासंगिकता बनी रहती है; दूसरा, वह परिषद के भीतर से ही यूएनएससी सुधार की माँग को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता है।
यूएनएससी सुधार में भारत के साथ और कौन-से देश हैं?
भारत, जर्मनी, जापान और ब्राज़ील — जिन्हें सामूहिक रूप से 'जी-4' कहा जाता है — यूएनएससी में स्थायी सीट के प्रमुख दावेदार माने जाते हैं। ये देश दशकों से परिषद के विस्तार और सुधार की माँग करते आए हैं, हालाँकि P5 देशों की सहमति अभी तक नहीं बन पाई है।
राष्ट्र प्रेस
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