सत्ता परिवर्तन की बात संवैधानिक है, लोकतंत्र जनता का शासन: विजेता दहिया का पलटवार
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 17 अक्टूबर — कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के पूर्व प्रवक्ता विजेता दहिया ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के 'सत्ता परिवर्तन' संबंधी बयान का खुलकर समर्थन किया और कहा कि ऐसी बात करना पूरी तरह संवैधानिक है। उन्होंने 2013 में प्रधानमंत्री के एक पुराने वायरल भाषण का हवाला देते हुए तर्क दिया कि मौजूदा सरकार यह भूल गई है कि लोकतंत्र मूलतः जनता का, जनता के द्वारा शासन की व्यवस्था है।
सत्ता परिवर्तन पर विजेता दहिया का तर्क
विजेता दहिया ने कहा, 'सत्ता परिवर्तन की बात करना संवैधानिक है और निश्चित तौर पर है। प्रधानमंत्री का 2013 का एक पुराना भाषण भी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश की जनता सरकार को उखाड़ फेंकना चाहती है।' उन्होंने आगे कहा कि सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जब कोई सरकार काम नहीं करती, तो जनता उसकी कमियाँ उजागर करती है, मीडिया रिपोर्ट करता है और मतदाता अगले चुनाव में विकल्प चुनते हैं — 'इसी को सत्ता परिवर्तन कहते हैं।'
यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रशांत भूषण के 'सत्ता परिवर्तन' वाले वक्तव्य को लेकर राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ी हुई है और सरकार समर्थक खेमे ने इसे संविधान-विरोधी करार देने की कोशिश की है।
सीजेपी की फंडिंग पर सफाई
कॉकरोच जनता पार्टी की फंडिंग को लेकर उठे सवालों पर दहिया ने स्पष्ट किया कि वे अब सीजेपी का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए संगठन की वर्तमान वित्त व्यवस्था के बारे में वे जानकारी देने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जब तक वे जुड़े थे, तब तक उन्होंने हैदराबाद यात्रा की फ्लाइट और जंतर-मंतर तक रोज़ाना आने-जाने का खर्च खुद वहन किया था। उनके अनुसार, 'मैंने सीजेपी के फंड से या किसी अन्य स्रोत से एक रुपया भी नहीं लिया।'
आम आदमी पार्टी से कनेक्शन के आरोपों पर जवाब
आम आदमी पार्टी (AAP) और सीजेपी के बीच संबंध के आरोपों पर दहिया ने इसे 'बहुत व्यक्तिपरक मामला' बताया। उन्होंने कहा कि जब तक वे सीजेपी से जुड़े रहे, उन्हें ऐसा कोई ठोस संबंध नज़र नहीं आया। उनका कहना था कि हर व्यक्ति की अपनी वैचारिक सोच होती है और उसे किसी एक दल की छाया में नहीं देखा जाना चाहिए।
नेताओं की प्रदर्शन स्थलों से गैरमौजूदगी का बचाव
जब उनसे पूछा गया कि अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका पुलिस कार्रवाई के दौरान विरोध स्थलों पर मौजूद क्यों नहीं रहते, तो दहिया ने कहा कि एक पुरानी कहावत है — लोग दुष्कर्मियों को भी नेता के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन प्रदर्शनकारियों से संत होने की उम्मीद रखते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों को ही हमेशा आलोचनात्मक लेंस के नीचे क्यों रखा जाता है।
नेहा बोरा के 'बांग्लादेश' वाले बयान पर स्पष्टीकरण
आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की 'बांग्लादेश रास्ता दिखा रहा है' वाली टिप्पणी को लेकर दहिया ने कहा कि उनके बयानों को बार-बार संदर्भ से काटकर पेश किया जाता है। उन्होंने सोनम वांगचुक का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके बारे में भी इसी तरह की भ्रामक रिपोर्टिंग हुई थी, जबकि बाद में फैक्ट-चेक में स्पष्ट हुआ कि उन्होंने कहा था — 'हमें बांग्लादेश से प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाना चाहिए।' दहिया के अनुसार, नेहा बोरा की वैचारिक स्पष्टता मज़बूत है और उनके बयान को उसी संदर्भ में समझना ज़रूरी है।
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय में उभरा है जब नागरिक समाज और सरकार के बीच असहमति की सीमाओं पर राष्ट्रीय बहस तेज़ हो रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर प्रतिक्रियाएँ सामने आने की संभावना है।