सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के कल्लू खान का मुआवजा ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹7.5 लाख किया, 28 साल की लड़ाई खत्म
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 9 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी कल्लू खान को बड़ी राहत देते हुए उनका मुआवजा ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹7.5 लाख कर दिया। खान ने 10 सितंबर 1998 से शुरू होकर करीब 28 साल तक अपने कानूनी अधिकारों के लिए संघर्ष किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित है और भविष्य के मामलों में इसे मिसाल नहीं माना जाएगा।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कल्लू खान की अपील पर यह आदेश सुनाया। खान ने 19 नवंबर 1990 से 1 सितंबर 1998 तक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्य किया था। सेवा समाप्त होने के बाद उन्होंने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2ए(2) के तहत उचित मंच पर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी।
श्रम न्यायालय ने 18 फरवरी 2020 को खान के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने, सेवा की निरंतरता बनाए रखने, पूरा बकाया वेतन देने और अन्य परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट का रुख और बदलाव
राजस्थान उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने 5 मार्च 2021 को श्रम न्यायालय के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए बकाया वेतन को 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया, जबकि सेवा में बहाली का निर्देश बरकरार रखा। इसके बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 4 अगस्त 2025 को एक और बड़ा बदलाव करते हुए बहाली और बकाया वेतन के सभी लाभ समाप्त कर उनके स्थान पर मात्र ₹5 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।
खान ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की। 12 दिसंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उन्हें अन्य कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी। तत्पश्चात खान ने हाईकोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की, जिसे खंडपीठ ने 11 फरवरी 2026 को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क
पीठ ने माना कि हाईकोर्ट के 4 अगस्त 2025 के आदेश की शुद्धता की पुनः जाँच इस कार्यवाही में संभव नहीं है, क्योंकि उसे पहले ही चुनौती दी जा चुकी थी और उस समय हस्तक्षेप नहीं किया गया था। हालांकि, न्यायमूर्ति भुइयां की अगुवाई वाली पीठ ने मुआवजे की राशि तय करते समय तीन प्रमुख तथ्यों को ध्यान में रखा — खान की सेवा अवधि, 10 सितंबर 1998 से 4 अगस्त 2025 तक चला उनका दीर्घकालीन कानूनी संघर्ष, और यह तथ्य कि बहाली की स्थिति में वे लगभग तीन साल और सेवा दे सकते थे।
गौरतलब है कि जिला शिक्षा अधिकारी को नोटिस की तामील के बाद भी उन्होंने अपील का विरोध नहीं किया, जिसके चलते 24 सितंबर 2026 को उन्हें मामले में एकतरफा घोषित कर दिया गया।
आम जनता और श्रमिकों पर असर
यह मामला उन हजारों संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति को उजागर करता है जो सरकारी विभागों में सेवारत होते हैं और नौकरशाही तथा न्यायिक देरी के बीच न्याय के लिए वर्षों तक संघर्ष करते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब श्रम सुधार और संविदा कर्मचारियों के अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस जारी है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की अवधि स्वयं में एक सामाजिक असमानता को दर्शाती है।
क्या होगा आगे
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि बढ़ी हुई ₹7.5 लाख की मुआवजा राशि का भुगतान अपीलकर्ता कल्लू खान को एक महीने के भीतर किया जाए। अदालत ने दोहराया कि यह आदेश केवल इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों पर लागू होता है और इसे किसी अन्य मामले में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।