सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: हाई कोर्ट कस्टोडियल पूछताछ का सुझाव नहीं दे सकता
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि किसी आरोपी से हिरासत में पूछताछ (कस्टोडियल इंटरोगेशन) की जाए या नहीं, यह तय करना किसी उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पूछताछ की पद्धति निर्धारित करना पूरी तरह जांच एजेंसी के विवेकाधिकार में आता है। यह टिप्पणी गुजरात हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए की गई, जिसमें अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करते समय हिरासत में पूछताछ को अनिवार्य बताया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ मितेशगिरी उर्फ मुलराजगिरी सेवागिरी गोस्वामी और उनकी पत्नी इलाबेन मितेशगिरी गोस्वामी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस दंपती पर आरोप है कि उन्होंने गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित श्री सेकेंडरी स्कूल, वेकारिया के प्राचार्य के सेवा रिकॉर्ड में कथित तौर पर छेड़छाड़ की। पहले अपीलकर्ता उक्त स्कूल के प्राचार्य थे, जबकि दूसरी अपीलकर्ता स्कूल प्रबंधन समिति की अध्यक्ष थीं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने प्राचार्य की जन्मतिथि 19 जून 1964 से बदलकर 19 जून 1965 कर दी, जिससे उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख आगे बढ़ गई और सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचाकर अनुचित लाभ अर्जित किया गया। इस मामले में विसावदर पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
गुजरात हाई कोर्ट का विवादास्पद आदेश
गुजरात उच्च न्यायालय ने 16 जून 2026 को अपने आदेश में कहा था कि 'सच्चाई सामने लाने के लिए केवल आवेदक ही नहीं, बल्कि अन्य सभी संदिग्धों से भी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।' इसी आधार पर हाई कोर्ट ने दंपती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती का विषय बना।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
न्यायमूर्ति भुइयां की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा, 'हमारा स्पष्ट मत है कि किसी आरोपी से किस प्रकार पूछताछ की जाए, इसका सुझाव देना हाई कोर्ट का काम नहीं है। यह निर्णय जांच एजेंसी के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए।'
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस प्रकार की व्यापक टिप्पणियाँ उन व्यक्तियों के अधिकारों को भी प्रभावित कर सकती हैं जिन्हें अभी तक मामले में आरोपी भी नहीं बनाया गया है। पीठ ने कहा, 'हाई कोर्ट को ऐसी अनावश्यक टिप्पणियों से बचना चाहिए।'
दस्तावेज़ी साक्ष्य और हिरासत की ज़रूरत नहीं
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में लगाए गए आरोपों की प्रकृति का परीक्षण करते हुए पाया कि प्राथमिकी मुख्यतः दस्तावेज़ी साक्ष्यों पर आधारित है। पीठ ने कहा, 'अपीलकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति को देखते हुए, जो पूरी तरह दस्तावेजों पर आधारित हैं, हम मानते हैं कि उनकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक नहीं है।'
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 25 अगस्त को ही अंतरिम आदेश देते हुए कहा था कि जांच में सहयोग की शर्त पर अपीलकर्ताओं को गिरफ्तार न किया जाए। बाद में गुजरात सरकार के हलफनामे का अवलोकन करने के उपरांत शीर्ष अदालत ने इस अंतरिम संरक्षण को स्थायी रूप दे दिया।
फैसले का व्यापक असर
यह निर्णय केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं है — यह उच्च न्यायालयों की उस प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण संकेत है, जहाँ जमानत अर्जियों पर आदेश देते समय जांच की दिशा तय करने जैसी टिप्पणियाँ की जाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अंततः गुजरात हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए दंपती की अपील स्वीकार कर ली और उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान की।