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सेंथिल बालाजी का इनकार: 'न फरार हूँ, न कानून से भाग रहा' — ट्रिप्लिकेन पुलिस को पत्र, कानूनी सुरक्षा की माँग

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सेंथिल बालाजी का इनकार: 'न फरार हूँ, न कानून से भाग रहा' — ट्रिप्लिकेन पुलिस को पत्र, कानूनी सुरक्षा की माँग

सारांश

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी ने पुलिस को पत्र लिखकर फरार होने के किसी भी आरोप को खारिज किया और BNSS धारा 35(3) के तहत विधिवत नोटिस की माँग की। मद्रास उच्च न्यायालय की अग्रिम जमानत शर्त के बावजूद थाने में पेश न होने के बाद यह कानूनी खींचतान तेज हो गई है।

मुख्य बातें

सेंथिल बालाजी और भाई अशोक कुमार ने 15 जुलाई 2026 को ट्रिप्लिकेन थाने को पत्र लिखकर फरार होने से इनकार किया।
मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत में थाने में उपस्थित होने की शर्त के बावजूद दोनों भाई पुलिस के सामने पेश नहीं हुए।
दोनों का तर्क है कि प्राथमिकी में उनके नाम आरोपी के रूप में दर्ज नहीं हैं, इसलिए पूछताछ के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
पूछताछ से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत विधिवत नोटिस जारी करने की माँग की गई।
दोनों ने यह भी माँग की कि उनकी उपस्थिति का उपयोग किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी के लिए न किया जाए।
ट्रिप्लिकेन थाना पुलिस पत्र की समीक्षा कर रही है और कानूनी राय लेने पर विचार कर रही है।

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री वी. सेंथिल बालाजी और उनके भाई अशोक कुमार ने 15 जुलाई 2026 को चेन्नई के ट्रिप्लिकेन थाने को एक औपचारिक पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि वे न तो फरार हैं और न ही कानूनी प्रक्रिया से बचने का कोई प्रयास कर रहे हैं। साथ ही दोनों भाइयों ने यह भी सवाल उठाया कि उन्हें पूछताछ के लिए किस कानूनी आधार पर बुलाया जा रहा है। यह पत्र पिछली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सरकार को कथित तौर पर अस्थिर करने की साजिश से जुड़े मामले की जाँच के संदर्भ में लिखा गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

इससे पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने दोनों भाइयों को अग्रिम जमानत प्रदान की थी। हालाँकि, न्यायालय ने यह शर्त भी जोड़ी थी कि उन्हें ट्रिप्लिकेन थाने में उपस्थित होकर जाँच में सहयोग करना होगा। इस शर्त के बावजूद दोनों भाई पुलिस के सामने पेश नहीं हुए, जिसके बाद यह पत्र-व्यवहार सामने आया। गौरतलब है कि यह मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि सेंथिल बालाजी DMK सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

कानूनी तर्क और दोनों भाइयों का पक्ष

सेंथिल बालाजी और अशोक कुमार ने अपने पत्र में तर्क दिया कि प्राथमिकी में उनके नाम आरोपी के रूप में दर्ज नहीं हैं। उनके अनुसार, केवल इसी आधार पर उन्हें पूछताछ के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। दोनों ने माँग की कि यदि जाँच एजेंसी उनसे पूछताछ करना चाहती है, तो उसे पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 की उपधारा 3 के तहत विधिवत नोटिस जारी करना होगा।

सेंथिल बालाजी ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि वे एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और कई व्यावसायिक संस्थानों का संचालन करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने कानूनी कार्रवाई से बचने की कोशिश की है।

माँगी गई कानूनी सुरक्षा

दोनों भाइयों ने जाँच अधिकारियों के सामने पेश होने से पहले कुछ विशेष सुरक्षा उपायों की माँग रखी है। उन्होंने अनुरोध किया है कि इस मामले में पूछताछ के लिए उनकी उपस्थिति का उपयोग किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी के आधार के रूप में न किया जाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने यह भी माँग की कि जाँच के दौरान यदि आवश्यकता हो, तो उन्हें उचित चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि वे कानून के तहत मिलने वाले सभी प्रक्रियागत अधिकारों और सुरक्षा उपायों के पालन की गारंटी के साथ जाँच में सहयोग देने को तैयार हैं।

पुलिस की प्रतिक्रिया और आगे की कार्रवाई

पुलिस सूत्रों के अनुसार, ट्रिप्लिकेन थाना पुलिस इस पत्र की सामग्री की जाँच कर रही है और आगे की कार्रवाई पर विचार-विमर्श जारी है। जाँच अधिकारी दोनों भाइयों द्वारा उठाए गए मुद्दों — विशेष रूप से प्राथमिकी में उनके नाम न होने और विधिवत नोटिस की माँग — पर कानूनी राय ले सकते हैं। इस मामले का अगला कदम काफी हद तक इस कानूनी विश्लेषण पर निर्भर करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन पत्र के ज़रिए 'सहयोग की इच्छा' दर्ज कराना, अदालत की शर्त को व्यावहारिक रूप से नज़रअंदाज़ करते हुए कागज़ी अनुपालन का आभास देता है। BNSS धारा 35(3) का हवाला देना तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन उच्च न्यायालय की स्पष्ट शर्त के बाद यह तर्क न्यायिक धैर्य की परीक्षा लेता है। यह मामला इस बड़े सवाल को भी उठाता है कि अग्रिम जमानत की शर्तों का पालन न होने पर अदालतें किस हद तक प्रभावी हस्तक्षेप करती हैं — और क्या राजनीतिक हैसियत इस प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
RashtraPress
15 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सेंथिल बालाजी ने ट्रिप्लिकेन पुलिस को पत्र क्यों लिखा?
सेंथिल बालाजी और उनके भाई अशोक कुमार ने पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया कि वे फरार नहीं हैं और कानून से भागने की कोई कोशिश नहीं कर रहे। साथ ही उन्होंने पूछताछ के लिए बुलाए जाने के कानूनी आधार पर सवाल उठाया और BNSS धारा 35(3) के तहत विधिवत नोटिस की माँग की।
मद्रास उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत में क्या शर्त रखी थी?
मद्रास उच्च न्यायालय ने दोनों भाइयों को अग्रिम जमानत देते हुए शर्त रखी थी कि वे ट्रिप्लिकेन थाने में उपस्थित होकर जाँच में सहयोग करें। हालाँकि, दोनों इस शर्त के बावजूद पुलिस के सामने पेश नहीं हुए।
सेंथिल बालाजी ने किन कानूनी सुरक्षा उपायों की माँग की है?
उन्होंने माँग की है कि इस मामले में उनकी उपस्थिति का उपयोग किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी के लिए न किया जाए, जाँच के दौरान ज़रूरत पड़ने पर चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, और सभी प्रक्रियागत अधिकारों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
यह मामला किससे जुड़ा है?
यह जाँच पिछली DMK सरकार को कथित तौर पर अस्थिर करने की साजिश से जुड़े मामले से संबंधित है। सेंथिल बालाजी DMK सरकार में मंत्री रह चुके हैं और उनके भाई अशोक कुमार के साथ मिलकर वे इस जाँच के दायरे में आए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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