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केरल पीएससी विवाद: SFI और DYFI की खामोशी पर उठे सवाल, हाई कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार

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केरल पीएससी विवाद: SFI और DYFI की खामोशी पर उठे सवाल, हाई कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार

सारांश

केरल पीएससी की परीक्षा में 58 अंकों के उत्तर न जाँचे जाने का विवाद अब संवैधानिक संस्था की साख पर सवाल बन गया है। हाई कोर्ट की कड़ी फटकार और क्राइम ब्रांच जाँच के बीच सीपीआईएम के SFI और DYFI की चुप्पी ने राजनीतिक दोहरे मापदंड की बहस छेड़ दी है।

मुख्य बातें

केरल पीएससी की स्टेट प्लानिंग बोर्ड परीक्षा में 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न किए जाने की कथित अनियमितता उजागर हुई।
संशोधित रैंक लिस्ट में श्याम कृष्णन प्रथम स्थान पर आए; पहले नौकरी पा चुके अरुण जे.
प्रताप पाँचवें स्थान पर खिसके।
केरल उच्च न्यायालय ने पीएससी को कड़ी फटकार लगाई और 150 से अधिक शिकायतें संज्ञान में लीं।
सरकार ने पीएससी की 'तकनीकी गलती' की दलील को नकारा; क्राइम ब्रांच की जाँच जारी।
मौजूदा 16-सदस्यीय आयोग पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली LDF सरकार द्वारा नियुक्त।
SFI और DYFI की चुप्पी पर सवाल, जबकि कांग्रेस नेता की पत्नी की नियुक्ति पर इन्हीं संगठनों ने विरोध किया था।

केरल पब्लिक सर्विस कमीशन (पीएससी) की स्टेट प्लानिंग बोर्ड परीक्षा में कथित गंभीर अनियमितताओं को लेकर छिड़ा विवाद अब राज्य की प्रमुख संवैधानिक भर्ती संस्था की साख पर सवाल उठा रहा है। इस पूरे प्रकरण में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — सीपीआईएम — के छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और युवा संगठन डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) की चुप्पी ने राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है।

मुख्य घटनाक्रम

विवादित परीक्षा की संशोधित रैंक लिस्ट में श्याम कृष्णन पहले स्थान पर आ गए हैं। उन्होंने मूल्यांकन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था। दूसरी ओर, अरुण जे. प्रताप — जिन्हें वामपंथी विचारधारा का समर्थक बताया जाता है और जो मूल लिस्ट में शीर्ष पर रहकर नौकरी पा चुके थे — अब पाँचवें स्थान पर खिसक गए हैं।

पीएससी अब श्याम कृष्णन की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने और प्रताप के लिए पहले जारी की गई नियुक्ति सिफारिश को रद्द करने की तैयारी में है। हालाँकि, रिपोर्टों के अनुसार प्रताप एक वर्ष से अधिक समय से उस पद पर कार्यरत हैं, जिससे एक नई कानूनी लड़ाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट और क्राइम ब्रांच की सक्रियता

इस सप्ताह की शुरुआत में केरल उच्च न्यायालय ने तीखे शब्दों में सवाल उठाया कि क्या परीक्षा में 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न किया जाना खुलेआम भ्रष्टाचार के बराबर है। अदालत ने इस बात पर बल दिया कि नौकरी के लाखों उम्मीदवार पीएससी पर भरोसा करते हैं और इस संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखना अनिवार्य है।

सरकार ने पीएससी के उस तर्क को खारिज किया है जिसमें इस चूक को महज़ एक लिपिकीय या तकनीकी गलती बताया गया था। सरकार का कहना है कि उत्तरों का मूल्यांकन न करना जानबूझकर की गई हेरफेर का संकेत हो सकता है। इस बीच, क्राइम ब्रांच की जाँच तेज़ हो रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यह चूक अनजाने में हुई या किसी खास उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने के इरादे से।

पीएससी के खिलाफ 150 से अधिक शिकायतें भी उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाई गई हैं। आयोग ने हाई कोर्ट में क्राइम ब्रांच की जाँच को ही चुनौती दे दी है।

SFI और DYFI की चुप्पी पर सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब क्राइम ब्रांच जाँच कर रही है और हाई कोर्ट फटकार लगा रहा है, तब SFI और DYFI मौन क्यों हैं। गौरतलब है कि हाल ही में वामपंथी विचारधारा से जुड़े एक संगठन ने राज्य सरकार के एक संस्थान में एक कांग्रेस नेता की पत्नी की अनुबंध आधारित नियुक्ति के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन किया था।

उस मामले में सक्रिय प्रतिक्रिया और पीएससी विवाद पर मौन के बीच के अंतर ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ये संगठन अपने ही राजनीतिक खेमे से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर भी वही मानदंड अपनाते हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

मौजूदा 16 सदस्यीय पीएससी आयोग — जिसमें एक अध्यक्ष और 15 सदस्य शामिल हैं — को पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार ने नियुक्त किया था। विवादित भर्ती प्रक्रिया भी उसी सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी, जो इस विवाद को राजनीतिक रूप से और अधिक संवेदनशील बनाती है।

आगे क्या होगा

यह विवाद आने वाले दिनों में और गहरा हो सकता है क्योंकि एक ओर उच्च न्यायालय मामले की निगरानी कर रहा है, दूसरी ओर क्राइम ब्रांच की जाँच में और भी कथित अनियमितताएं सामने आने की संभावना जताई जा रही है। श्याम कृष्णन की नियुक्ति को लेकर जो नई कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी, वह पीएससी की कार्यशैली और स्वायत्तता दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाएगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इनकी जवाबदेही विचारधारा पर नहीं, राजनीतिक सुविधा पर टिकी है।
RashtraPress
10 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल पीएससी विवाद क्या है?
केरल पब्लिक सर्विस कमीशन की स्टेट प्लानिंग बोर्ड परीक्षा में 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न किए जाने की कथित अनियमितता सामने आई है। इससे मूल रैंक लिस्ट और नियुक्तियाँ विवादित हो गई हैं और मामला अदालत और क्राइम ब्रांच तक पहुँच गया है।
संशोधित रैंक लिस्ट में क्या बदला?
संशोधित रैंक लिस्ट में श्याम कृष्णन पहले स्थान पर आ गए हैं, जबकि मूल लिस्ट में शीर्ष पर रहकर नौकरी पा चुके अरुण जे. प्रताप पाँचवें स्थान पर आ गए हैं। पीएससी अब श्याम कृष्णन की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने और प्रताप की सिफारिश रद्द करने की तैयारी में है।
केरल उच्च न्यायालय ने पीएससी को क्यों फटकारा?
उच्च न्यायालय ने सवाल उठाया कि 58 अंकों के उत्तरों का मूल्यांकन न करना खुलेआम भ्रष्टाचार के बराबर हो सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि लाखों उम्मीदवारों का पीएससी पर भरोसा बनाए रखना ज़रूरी है और 150 से अधिक शिकायतें उसके संज्ञान में लाई गई हैं।
SFI और DYFI की चुप्पी पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
इन संगठनों ने हाल ही में कांग्रेस नेता की पत्नी की अनुबंध नियुक्ति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था, लेकिन पीएससी में कथित अनियमितताओं — जिनसे वामपंथी विचारधारा के समर्थक उम्मीदवार लाभान्वित हुए बताए जाते हैं — पर वे मौन हैं। यह दोहरा मापदंड उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
इस मामले में क्राइम ब्रांच की जाँच का दायरा क्या है?
क्राइम ब्रांच यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मूल्यांकन में हुई चूक अनजाने में थी या जानबूझकर किसी खास उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने के इरादे से की गई। जाँच में राज्य की प्रमुख भर्ती एजेंसी की और अधिक कथित अनियमितताएं भी सामने आने की संभावना है।
राष्ट्र प्रेस
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