केरल हाईकोर्ट का PSC पर कड़ा सवाल: '58 नंबर की जांच न करना क्या खुला भ्रष्टाचार था?'
सारांश
मुख्य बातें
केरल हाईकोर्ट ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को केरल पब्लिक सर्विस कमीशन (PSC) से स्टेट प्लानिंग बोर्ड की भर्ती परीक्षा में 58 अंकों के जवाबों का मूल्यांकन न किए जाने को लेकर तीखे सवाल दागे। अदालत ने सीधे पूछा कि क्या यह गंभीर चूक स्पष्ट रूप से भ्रष्टाचार थी और क्या एक संवैधानिक भर्ती संस्था के भीतर कथित अपराधों की जांच के लिए कोई तंत्र नहीं होना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
2022 में जारी अधिसूचना के आधार पर जुलाई 2023 में आयोजित यह परीक्षा स्टेट प्लानिंग बोर्ड के 'चीफ' स्तर के तीन पदों के लिए हुई थी। परीक्षा में कुल 228 उम्मीदवार शामिल हुए थे। पहले पेपर में 10 प्रश्नों — जो कुल 58 अंकों के थे — का मूल्यांकन ही नहीं किया गया। इसके बावजूद रैंक सूची जारी की गई और दो पदों पर नियुक्तियाँ कर दी गईं। गौरतलब है कि यह भर्ती प्रक्रिया पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी।
हाईकोर्ट के सवाल और टिप्पणियाँ
अदालत उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें PSC ने इस मामले में क्राइम ब्रांच की जांच को चुनौती दी है। कोर्ट ने कहा कि PSC वह संस्था है जिस पर लाखों नौकरी के उम्मीदवार निर्भर हैं और उसकी विश्वसनीयता तथा युवा पीढ़ी की उम्मीदों की रक्षा अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि नोटिस मिलने के बावजूद अधिकारी जांच दल के समक्ष उपस्थित क्यों नहीं हुए।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांचकर्ताओं के सामने पेश होना PSC अधिकारियों की नैतिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी नोटिस के बाद भी अनुपस्थित रहते हैं, तो सरकार को सख्त कार्रवाई पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने PSC के इस तर्क का विरोध किया कि यह चूक महज एक क्लर्क की या तकनीकी गलती थी। सरकारी वकील ने दलील दी कि '58 अंकों के जवाबों की जांच न करने को क्लर्क की गलती कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।' सरकार ने यह भी बताया कि PSC के विरुद्ध 150 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं और संस्था के चेयरमैन एवं सदस्य जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह चूक सुनियोजित हेरफेर का परिणाम थी, न कि सामान्य प्रशासनिक भूल।
PSC का रुख और संवैधानिक स्थिति
PSC ने हाईकोर्ट से आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की माँग करते हुए तर्क दिया है कि यह चूक अनजाने में हुई। संस्था ने सरकार की ओर से मुकदमा चलाने की मंजूरी को भी अदालत में चुनौती दी है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार, राज्य PSC के चेयरमैन और सदस्य छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु तक — जो भी पहले हो — अपने पद पर बने रहते हैं। वर्तमान PSC में एक चेयरमैन और 15 सदस्य हैं, जिनकी नियुक्ति पिछली विजयन सरकार के कार्यकाल में हुई थी।
क्राइम ब्रांच की जांच और आगे का रास्ता
क्राइम ब्रांच अब इस बात की जांच कर रही है कि मूल्यांकन में हुई यह चूक महज एक अनजाने में हुई गलती थी या फिर कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर की गई साजिश। यह ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में सरकारी भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। अदालत की अगली सुनवाई में PSC अधिकारियों की जांच में उपस्थिति और सरकार की संभावित कार्रवाई पर निर्णय होने की उम्मीद है।