केरल पीएससी परीक्षा घोटाला: क्राइम ब्रांच को मिली कानूनी राय, पीएससी सदस्यों की पूछताछ का रास्ता साफ
सारांश
मुख्य बातें
केरल क्राइम ब्रांच को राज्य योजना बोर्ड परीक्षा घोटाले की जांच में एक अहम कानूनी मोड़ मिला है — जांच एजेंसी को प्राप्त विधिक राय में स्पष्ट कहा गया है कि केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) के चेयरमैन और सदस्य क्राइम ब्रांच द्वारा तय स्थान पर पूछताछ से छूट का दावा नहीं कर सकते। 18 सितंबर 2026 को सामने आई इस कानूनी राय के बाद तिरुवनंतपुरम में जांच का दायरा और तेज होने की उम्मीद है।
मुख्य घटनाक्रम
जांच एजेंसी की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) पहले ही पीएससी चेयरमैन और उसके सदस्यों को पूछताछ के लिए नोटिस जारी कर चुकी है। इसके बावजूद पीएससी सदस्य एस.ए. सैफ 15 सितंबर को क्राइम ब्रांच के सामने पेश नहीं हुए, जो इस टकराव को और तीखा बनाता है।
सूत्रों के अनुसार, नई कानूनी राय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पीएससी को प्राप्त संवैधानिक दर्जा उसके सदस्यों को आपराधिक जांच में सहयोग करने की बाध्यता से मुक्त नहीं करता। क्राइम ब्रांच अब इस राय को औपचारिक रूप से कमीशन को सूचित करने की तैयारी में है।
पीएससी का पुराना रुख और संवैधानिक तर्क
पीएससी ने अब तक यह रुख अपनाया था कि उसके सदस्य संवैधानिक पदों पर आसीन हैं, इसलिए उन्हें क्राइम ब्रांच मुख्यालय में पूछताछ के लिए बुलाने की बजाय पीएससी कार्यालय में ही बयान दर्ज किए जाएं। आयोग ने केरल उच्च न्यायालय के एक पुराने आदेश का भी हवाला दिया था, जिसमें पीएससी अधिकारियों को विधानसभा समिति के समक्ष पेश होने से राहत दी गई थी।
हालाँकि, क्राइम ब्रांच का तर्क है कि वह विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आपराधिक जांच है — और ये दोनों संदर्भ कानूनी रूप से भिन्न हैं। यह ऐसे समय में आया है जब पीएससी और राज्य की जांच एजेंसियों के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर बहस पहले से जारी है।
परीक्षा घोटाले की पृष्ठभूमि
यह विवाद राज्य योजना बोर्ड में वरिष्ठ पदों के लिए पीएससी द्वारा आयोजित परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच से शुरू हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, एसआईटी ने परीक्षाओं के आयोजन और मूल्यांकन में गंभीर खामियाँ पाई हैं तथा इन परीक्षाओं के आधार पर की गई नियुक्तियों की समीक्षा की सिफारिश की है।
जांचकर्ता यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ये अनियमितताएं प्रक्रियागत चूक थीं या कुछ उम्मीदवारों को जानबूझकर लाभ पहुँचाने की सुनियोजित कोशिश। गौरतलब है कि यह केरल में सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठा एक बड़ा सवाल है, जहाँ पीएससी परीक्षाएं लाखों युवाओं के करियर से जुड़ी हैं।
आगे क्या होगा
कानूनी राय के बाद अब पीएससी के पास कई विकल्प हैं — वह अपना रुख बदल कर सहयोग कर सकता है, या न्यायिक हस्तक्षेप के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। अगर पीएससी अदालत जाता है, तो यह मामला संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और आपराधिक जांच एजेंसियों की शक्तियों के बीच की सीमा-रेखा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बन सकता है।
क्राइम ब्रांच के पास अब अपने पक्ष में विधिक राय है और पीएससी की प्रतिक्रिया पर सबकी नज़रें टिकी हैं। यह देखना होगा कि केरल में भर्ती पारदर्शिता की यह लड़ाई किस दिशा में जाती है।