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शरद पूर्णिमा पर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में महारास उत्सव, साल में एक बार होते हैं सोलह शृंगार

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शरद पूर्णिमा पर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में महारास उत्सव, साल में एक बार होते हैं सोलह शृंगार

सारांश

साल में बस एक रात — शरद पूर्णिमा — जब वृंदावन के बांके बिहारी जी गर्भगृह से बाहर आते हैं, चाँदी के सिंहासन पर विराजते हैं और बंसी-मोर-मुकुट सहित संपूर्ण सोलह शृंगार धारण करते हैं। महारास की इस दिव्य स्मृति में उमड़ने वाली भीड़ ही बताती है कि यह आस्था का उत्सव कितना गहरा है।

मुख्य बातें

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा पर वार्षिक महारास उत्सव का आयोजन होता है।
ठाकुर बांके बिहारी जी वर्षभर में केवल इसी रात बंसी और मोर-मुकुट सहित सोलह शृंगार धारण करते हैं।
इस अवसर पर ठाकुर जी गर्भगृह से बाहर 'जगमोहन' में चाँदी के सिंहासन पर विराजमान होते हैं।
प्रभु को सफेद वस्त्र , खीर और चंद्रकला का विशेष भोग अर्पित किया जाता है।
चंद्रमा की अमृतमयी किरणों में रखी खीर को अगले दिन औषधीय प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है।

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में शरद पूर्णिमा का उत्सव अपनी दिव्यता और आस्था के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के लिए वर्षभर प्रतीक्षा का केंद्र रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा की रात ही भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर गोपियों के साथ महारास रचाया था, और इसी पावन स्मृति में यह वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। यह वह एकमात्र अवसर है जब ठाकुर बांके बिहारी जी वर्षभर में एकमात्र बार संपूर्ण सोलह शृंगार में भक्तों को दर्शन देते हैं।

महारास की पावन परंपरा

धार्मिक आस्था के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में यमुना नदी के तट पर गोपियों संग महारास रचाया था। इसी दिव्य लीला की स्मृति में बांके बिहारी मंदिर में प्रतिवर्ष यह उत्सव आयोजित होता है। देश के विभिन्न कोनों से श्रद्धालु इस विशेष दर्शन के लिए वृंदावन पहुँचते हैं।

ठाकुर जी का अनूठा शृंगार

शरद पूर्णिमा के अवसर पर ठाकुर बांके बिहारी जी अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर 'जगमोहन' में चाँदी के सिंहासन पर विराजमान होते हैं। यह वर्ष में एकमात्र रात होती है जब वे अपने कर-कमलों में बंसी और मोर-मुकुट सहित सोलह शृंगार धारण करते हैं। इस दिन सफेद वस्त्रों में सजे ठाकुर जी को खीर और चंद्रकला का विशेष भोग अर्पित किया जाता है।

भक्तिमय वातावरण और आस्था का ज्वार

मंदिर परिसर में गूँजते भजन, जयकारों और अगरबत्ती की सुगंध से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बावजूद हर भक्त इस दिव्य छवि का दर्शन पाने को आतुर रहता है। गौरतलब है कि बांके बिहारी मंदिर का यह उत्सव वृंदावन के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है।

चंद्रमा की अमृत किरणें और खीर की परंपरा

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, इसलिए इस रात खुले आसमान के नीचे खीर रखने की परंपरा प्रचलित है। मान्यता है कि जब चंद्रमा की अमृतमयी किरणें खीर पर पड़ती हैं, तो उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं। अगले दिन प्रातःकाल इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से शारीरिक आरोग्य की प्राप्ति होती है — यह धार्मिक और पारंपरिक मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है।

आगे की उमीदें

इस वर्ष शरद पूर्णिमा के उपलक्ष्य में वृंदावन में श्रद्धालुओं की असाधारण भीड़ की उम्मीद है। मंदिर प्रशासन ने विशेष व्यवस्थाएँ की हैं ताकि भक्तों को ठाकुर बांके बिहारी जी के दिव्य सोलह शृंगार के दर्शन सुगमता से प्राप्त हो सकें। यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति भी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

आयुर्वेदिक लोकज्ञान का भी हिस्सा है — जिसे आधुनिक समय में पुनः स्वीकृति मिल रही है। वृंदावन की धार्मिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के लिए ऐसे उत्सव अपरिहार्य हैं, फिर भी भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान देने की ज़रूरत बनी रहती है।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी मंदिर में क्या खास होता है?
शरद पूर्णिमा पर वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी वर्षभर में एकमात्र बार संपूर्ण सोलह शृंगार धारण करते हैं और गर्भगृह से बाहर 'जगमोहन' में चाँदी के सिंहासन पर विराजमान होते हैं। इसी रात महारास उत्सव मनाया जाता है और भक्तों को यह दिव्य छवि देखने का अवसर मिलता है।
महारास क्या है और इसका शरद पूर्णिमा से क्या संबंध है?
महारास भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आश्विन मास की पूर्णिमा की रात यमुना तट पर गोपियों के साथ रचाई गई दिव्य लीला है। इसी पावन स्मृति में शरद पूर्णिमा को वृंदावन सहित देशभर के कृष्ण मंदिरों में उत्सव मनाया जाता है।
शरद पूर्णिमा पर बांके बिहारी जी को कौन-सा भोग लगाया जाता है?
इस विशेष अवसर पर ठाकुर बांके बिहारी जी को सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं और खीर तथा चंद्रकला का विशेष भोग अर्पित किया जाता है। यह भोग शरद पूर्णिमा की परंपरा से जुड़ा है।
शरद पूर्णिमा पर खीर रखने की परंपरा क्यों है?
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत जैसे औषधीय गुण होते हैं। खुले आसमान के नीचे रखी खीर पर चंद्र किरणें पड़ने से उसमें ये गुण आ जाते हैं, और अगले दिन इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने से आरोग्य मिलता है — यह पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा है।
वृंदावन बांके बिहारी मंदिर का शरद पूर्णिमा दर्शन कब होता है?
शरद पूर्णिमा की रात — आश्विन मास की पूर्णिमा — को बांके बिहारी मंदिर में यह विशेष दर्शन होता है। इस वर्ष 2026 में यह 25 अक्टूबर को है। देशभर से श्रद्धालु इस एकमात्र अवसर के लिए वृंदावन पहुँचते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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