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केजीएमयू शोध: मधुमेह से एमडीआर टीबी मरीजों में मौत का खतरा अधिक, दवाएं 133 दिन बाद असर करती हैं

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केजीएमयू शोध: मधुमेह से एमडीआर टीबी मरीजों में मौत का खतरा अधिक, दवाएं 133 दिन बाद असर करती हैं

सारांश

केजीएमयू लखनऊ के नए शोध ने चेतावनी दी है कि एमडीआर टीबी के साथ मधुमेह होने पर दवाएं औसतन 133 दिन बाद असर करती हैं — गैर-मधुमेह मरीजों के 97 दिनों की तुलना में कहीं अधिक। 264 मरीजों पर हुए इस अध्ययन का सीधा संदेश है: टीबी और मधुमेह का एकीकृत इलाज अब विकल्प नहीं, जरूरत है।

मुख्य बातें

केजीएमयू, लखनऊ के 2023-2024 के शोध में 264 एमडीआर टीबी मरीजों पर अध्ययन किया गया, जो वर्ल्ड जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ।
मधुमेह से पीड़ित एमडीआर टीबी मरीजों की बलगम जांच नकारात्मक होने में 133 दिन लगे, जबकि गैर-मधुमेह रोगियों में यह केवल 97 दिन में हुआ।
प्री-डायबिटीज (बॉर्डरलाइन मधुमेह) वाले मरीजों में यह अवधि 113 दिन रही — यानी यह भी उपचार को प्रभावित करती है।
मधुमेह पीड़ित मरीजों के जीवाणुओं में दवा प्रतिरोध बढ़ाने वाले आईएनएचए और केएटीजी जीन में म्यूटेशन पाया गया।
सूर्यकांत के अनुसार, हर एमडीआर टीबी मरीज की मधुमेह और प्री-डायबिटीज जांच अनिवार्य होनी चाहिए।
टीबी-मधुमेह एकीकृत देखभाल अपनाने से मृत्यु दर घटाई जा सकती है और राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान को बल मिलेगा।

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), लखनऊ के एक नए शोध में सामने आया है कि बहु दवा प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी से पीड़ित मरीजों में यदि टाइप-2 मधुमेह भी हो, तो टीबी-रोधी दवाओं का असर काफी देर से होता है — औसतन 133 दिन बाद बलगम जांच नकारात्मक आती है। यह शोध वर्ल्ड जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है और इसे 2023 से 2024 के बीच केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग ने संचालित किया।

शोध का स्वरूप और नमूना

इस अध्ययन में 264 एमडीआर टीबी मरीज शामिल किए गए — जिनमें 155 पुरुष और 109 महिलाएं थीं। इन्हें तीन समूहों में विभाजित किया गया: 61 मरीज टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित, 66 प्री-डायबिटीज (बॉर्डरलाइन मधुमेह) वाले, और 137 रोगी मधुमेह रहित। सभी को मुंह से ली जाने वाली टीबी-रोधी दवाएं दी गईं और समय-समय पर बलगम जांच व स्वास्थ्य सुधार की निगरानी की गई।

मुख्य निष्कर्ष

शोध में पाया गया कि मधुमेह पीड़ित एमडीआर टीबी मरीजों के फेफड़ों में अन्य रोगियों की तुलना में गंभीर संक्रमण और अधिक मात्रा में टीबी के जीवाणु मौजूद थे। इन जीवाणुओं में दवा प्रतिरोध बढ़ाने वाले आईएनएचए (inhA) और केएटीजी (katG) जीन में म्यूटेशन भी मिला।

बलगम जांच नकारात्मक होने में लगने वाले समय की तुलना करने पर स्पष्ट अंतर सामने आया: मधुमेह मरीजों में 133 दिन, प्री-डायबिटीज मरीजों में 113 दिन, और गैर-मधुमेह रोगियों में मात्र 97 दिन लगे। इलाज में इस देरी के कारण दोनों बीमारियों से ग्रसित मरीजों में मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों की राय

केजीएमयू के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत ने कहा कि भारत में टीबी और मधुमेह दोनों तेजी से बढ़ रही गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियां हैं। उन्होंने बताया कि एमडीआर टीबी के हर मरीज की मधुमेह और प्री-डायबिटीज की जांच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, और दोनों बीमारियों का एक साथ इलाज करने से बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।

सह-मार्गदर्शक डॉ. अजय कुमार वर्मा ने कहा कि एमडीआर टीबी के उपचार में केवल प्रभावी एंटी-टीबी दवाएं पर्याप्त नहीं हैं। उनके अनुसार, टीबी-मधुमेह एकीकृत देखभाल (Integrated TB-Diabetes Care) अपनाने से कल्चर कन्वर्जन में सुधार, उपचार की सफलता में वृद्धि और मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है।

केजीएमयू के श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी ने कहा कि दुनिया में सबसे अधिक टीबी और मधुमेह के मरीज भारत में हैं। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे मरीजों में रक्त शर्करा को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है, जिससे एमडीआर टीबी मरीजों के ठीक होने की दर बढ़ेगी और राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

शोध दल

इस अध्ययन में डॉ. योगिता वात्स, डॉ. अजय कुमार वर्मा, डॉ. पारुल जैन, डॉ. दर्शन बजाज, डॉ. आनंद श्रीवास्तव, डॉ. राम अवध सिंह कुशवाहा, डॉ. संतोष कुमार, डॉ. राजीव गर्ग, डॉ. अंकित कुमार तथा डॉ. अक्षय प्रधान का अहम योगदान रहा।

एमडीआर टीबी क्या है और यह क्यों घातक है

मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (एमडीआर टीबी) वह स्थिति है जिसमें टीबी के जीवाणुओं पर इस बीमारी की सबसे असरदार दवाएं बेअसर हो जाती हैं। यह सामान्य ड्रग-सेंसिटिव टीबी की तुलना में कहीं अधिक घातक होती है। इसके प्रमुख कारणों में अधूरा या अनियमित इलाज, गलत दवाओं का सेवन, एमडीआर टीबी मरीज से संक्रमण, जीवाणुओं का म्यूटेशन और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता शामिल हैं। इसकी जांच के लिए सीबी-नैट, जीन एक्सपर्ट, ट्रूनेट, एलपीए और बीडी मैक्स तकनीकों का उपयोग होता है।

यह शोध ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सरकार 2025 तक टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की ओर काम कर रही है। मधुमेह और टीबी के दोहरे बोझ को देखते हुए एकीकृत उपचार प्रोटोकॉल की दिशा में यह अध्ययन नीति-निर्माताओं के लिए एक अहम संदर्भ बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि दोनों बीमारियों का बोझ एक ही मरीज पर पड़ रहा है। भारत में दुनिया के सबसे अधिक टीबी और मधुमेह मरीज हैं, फिर भी राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) में मधुमेह स्क्रीनिंग को अनिवार्य प्रोटोकॉल का दर्जा नहीं मिला है। 264 मरीजों का यह अध्ययन भले ही सीमित पैमाने पर है, लेकिन इसका संदेश स्पष्ट है: जब तक दोनों बीमारियों की एकीकृत देखभाल नीति-स्तर पर लागू नहीं होती, 2025 के टीबी उन्मूलन लक्ष्य की राह और कठिन बनी रहेगी।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केजीएमयू के एमडीआर टीबी-मधुमेह शोध में क्या पाया गया?
शोध में पाया गया कि टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित एमडीआर टीबी मरीजों की बलगम जांच नकारात्मक होने में औसतन 133 दिन लगते हैं, जबकि गैर-मधुमेह मरीजों में यह 97 दिन में होता है। इससे इलाज लंबा खिंचता है और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।
प्री-डायबिटीज भी एमडीआर टीबी के इलाज को प्रभावित करती है?
हां, शोध में यह भी सामने आया कि प्री-डायबिटीज (बॉर्डरलाइन मधुमेह) वाले मरीजों में बलगम जांच नकारात्मक होने में 113 दिन लगे — गैर-मधुमेह मरीजों से 16 दिन अधिक। यानी पूर्ण मधुमेह न होने पर भी उपचार प्रभावित होता है।
एमडीआर टीबी मरीजों में मधुमेह की जांच क्यों जरूरी है?
प्रो. सूर्यकांत के अनुसार, मधुमेह एमडीआर टीबी में एक बड़ा जोखिम कारक है जो दवाओं के असर को धीमा करता है और जीवाणुओं में दवा प्रतिरोध बढ़ाने वाले जीन म्यूटेशन को बढ़ावा देता है। समय पर जांच और मधुमेह नियंत्रण से इलाज की सफलता दर बढ़ाई जा सकती है।
एमडीआर टीबी और सामान्य टीबी में क्या अंतर है?
एमडीआर टीबी (मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस) में टीबी के जीवाणुओं पर सबसे प्रभावी दवाएं बेअसर हो जाती हैं, जिससे इलाज कहीं अधिक लंबा और जटिल हो जाता है। अधूरे इलाज, अनियमित दवा सेवन और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता इसके प्रमुख कारण हैं।
यह शोध भारत के टीबी उन्मूलन लक्ष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में दुनिया के सर्वाधिक टीबी और मधुमेह मरीज हैं। डॉ. ज्योति बाजपेयी के अनुसार, टीबी-मधुमेह एकीकृत देखभाल अपनाने से एमडीआर टीबी मरीजों के ठीक होने की दर बढ़ेगी, जो राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन अभियान को सीधे मजबूती देगा।
राष्ट्र प्रेस
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