स्किन टीबी के मरीजों में डीआर-टीबी का बड़ा खतरा, केजीएमयू के शोध में 54 मरीजों पर अहम खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), लखनऊ के एक नए शोध में सामने आया है कि स्किन टीबी (त्वचा क्षय रोग) से पीड़ित मरीजों में दवा-प्रतिरोधी टीबी (डीआर-टीबी) का जोखिम गंभीर रूप से बढ़ रहा है। वर्ष 2019 से 2022 के बीच किए गए इस अध्ययन में शामिल 54 मरीजों में से 7 में दवा-प्रतिरोधी टीबी पाई गई, जो चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह शोध इंडियन जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी, वेनेरोलॉजी एंड लेप्रोलॉजी (IJDVL) में प्रकाशित हुआ है।
शोध का दायरा और मुख्य निष्कर्ष
केजीएमयू के त्वचा रोग विभाग द्वारा किए गए इस अध्ययन में 20 से 40 वर्ष आयु वर्ग के 54 स्किन टीबी मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीज एचआईवी निगेटिव थे। इनमें से 6 मरीजों पर टीबी की सबसे असरदार प्रथम-पंक्ति दवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था, जिसके कारण उन्हें बहु दवा-प्रतिरोधी (एमडीआर) टीबी की दवाएँ दी गईं। वहीं एक अन्य मरीज पर एक मुख्य टीबी-रोधी दवा असर नहीं कर रही थी और उसका इलाज निर्धारित मानक प्रोटोकॉल के तहत किया गया।
उल्लेखनीय बात यह रही कि इलाज शुरू होने के लगभग एक महीने के भीतर मरीजों की हालत में सुधार दिखने लगा और कोर्स पूरा करने वाले मरीजों में त्वचा के घाव पूरी तरह ठीक हो गए।
सात मरीजों में चार प्रकार की स्किन टीबी
दवा-प्रतिरोधी पाए गए इन सात मरीजों में स्किन टीबी के चार अलग-अलग प्रकार देखे गए। तीन मरीजों को ल्यूपस वल्गैरिस (त्वचा पर लाल-भूरे चकत्ते व घाव), दो को स्क्रोफूलोडरमा (गांठों से मवाद रिसना), एक को ट्यूबरकुलर एब्सेस (त्वचा के नीचे मवाद भरी गांठ) और एक मरीज को ट्यूबरकुलर चैंक्र (त्वचा पर छाले जैसा घाव) था।
गौरतलब है कि स्किन टीबी में बैक्टीरिया की संख्या सामान्यतः बहुत कम होती है, जिससे कल्चर जाँच द्वारा जीवाणु की पहचान और दवा-प्रतिरोध का पता लगाना अत्यंत कठिन हो जाता है। ऐसे में आधुनिक मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक टेस्ट अधिक सटीक नतीजे देते हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी
केजीएमयू के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के संस्थापक प्रभारी प्रो. सूर्यकांत के अनुसार, स्किन टीबी को केवल त्वचा तक सीमित बीमारी मानकर दवा-प्रतिरोध की संभावना को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों की जीन एक्सपर्ट, हिस्टोपैथोलॉजी, कल्चर और ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्टिंग (डीएसटी) जाँच अनिवार्य है।
केजीएमयू की प्रो. डॉ. पारुल वर्मा ने बताया कि दवा-प्रतिरोधी स्किन टीबी के लक्षण सामान्य स्किन टीबी जैसे ही होते हैं, इसलिए बाहरी जाँच से दोनों में अंतर कर पाना मुश्किल है। उन्होंने चेताया कि यदि दवा-प्रतिरोधी टीबी के मरीज को सामान्य टीबी की दवाएँ दी जाएँ, तो न केवल कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि संक्रमण छाती और मस्तिष्क तक फैल सकता है और स्थिति जानलेवा हो सकती है।
विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. स्वास्तिका सुविर्या के अनुसार, भारत में टीबी जीवाणुओं में ऐसे जेनेटिक बदलाव देखे गए हैं जिनकी वजह से वे दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं और सामान्य मॉलिक्यूलर टेस्ट इन्हें हमेशा पहचान नहीं पाते। उनके मुताबिक भविष्य में होल जीनोम सीक्वेंसिंग (WGS) जैसी उन्नत तकनीक इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकती है।
इलाज और सावधानियाँ
श्वसन रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्योति बाजपेयी ने बताया कि त्वचा पर घाव या अल्सर को मामूली समझकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। यदि सामान्य इलाज के बाद भी घाव 4 से 6 सप्ताह में ठीक न हो, तो स्किन टीबी की जाँच अवश्य करानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि स्किन टीबी का उपचार 9 से 18 महीने तक चल सकता है और दवा का कोर्स अधूरा छोड़ने पर डीआर-टीबी विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है।
यह शोध ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सरकार 2025 तक टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य की दिशा में काम कर रही है। प्रो. सूर्यकांत ने कहा कि क्षय रोग से मुक्ति के संकल्प में समाज के हर वर्ग — गाँव के प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक — को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इस शोध के निष्कर्ष स्किन टीबी के उपचार प्रोटोकॉल को और अधिक व्यापक बनाने की दिशा में नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत हैं।