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एक्स-रे से टीबी निदान: लखनऊ में गलत इलाज के मामले, विशेषज्ञों ने बताए सही जांच के तरीके

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एक्स-रे से टीबी निदान: लखनऊ में गलत इलाज के मामले, विशेषज्ञों ने बताए सही जांच के तरीके

सारांश

लखनऊ में एक मरीज को एक्स-रे देखकर टीबी की दवा दे दी गई, जबकि असल में उसे फेफड़ों की गाँठ थी। विशेषज्ञों के अनुसार 30% मामलों में अकेला एक्स-रे गलत साबित होता है। सही निदान के लिए CBNAAT और जीन एक्सपर्ट जाँच अनिवार्य है।

मुख्य बातें

लखनऊ के अहिमामऊ निवासी 46 वर्षीय प्रेमचंद को एक्स-रे देखकर टीबी की दवा दी गई, जबकि उन्हें फेफड़ों में गाँठ (लंग नोड्यूल) थी।
वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ.
आशुतोष दुबे के अनुसार, लगभग 30% मामलों में अकेले एक्स-रे पर आधारित निदान गलत होता है।
उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष 15 से 17 हजार एमडीआर टीबी के मामले दर्ज होते हैं; सिविल अस्पताल में हर माह 150–200 नए मरीज आते हैं।
एक अनुपचारित टीबी मरीज प्रतिवर्ष 15 अन्य लोगों को संक्रमित कर सकता है; बीच में दवा छोड़ने पर MDR/XDR टीबी का खतरा।
राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में EBUS तकनीक से बिना सर्जरी फेफड़ों की सटीक जाँच अब उपलब्ध।
सरकार टीबी मरीजों को पोषण सहायता के रूप में हर माह ₹1,000 प्रदान करती है।

लखनऊ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि केवल एक्स-रे और सामान्य लक्षणों के आधार पर टीबी (क्षय रोग) का इलाज शुरू करना मरीजों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न कर सकता है। 24 जुलाई को सामने आई जानकारी के अनुसार, राजधानी के अस्पतालों में ऐसे मामले नियमित रूप से दर्ज हो रहे हैं जहाँ बिना पुष्टि के टीबी की दवाएँ दी जा रही हैं।

मुख्य घटनाक्रम: गलत निदान का मामला

लखनऊ के अहिमामऊ निवासी 46 वर्षीय प्रेमचंद को लगातार खाँसी, साँस फूलने और वजन घटने की शिकायत पर एक निजी चिकित्सक ने एक्स-रे में धब्बे देखकर टीबी की दवा शुरू कर दी। एक सप्ताह तक दवा लेने के बावजूद उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया।

बाद में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल में विस्तृत जाँच के दौरान पता चला कि उन्हें टीबी नहीं, बल्कि फेफड़ों में गाँठ (लंग नोड्यूल) की समस्या है। इसके बाद टीबी की दवा तत्काल बंद कर दी गई। यह मामला इस बात की गंभीर मिसाल है कि अधूरी जाँच किस तरह मरीज की स्थिति को और जटिल बना सकती है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

सिविल अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दुबे के अनुसार, एक्स-रे में दिखाई देने वाला हर धब्बा टीबी का संकेत नहीं होता। फेफड़ों का कैंसर, गाँठ, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और टीबी के एक्स-रे कई बार एक जैसे दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि लगभग 30 प्रतिशत मामलों में केवल एक्स-रे के आधार पर किया गया आकलन गलत साबित होता है।

डॉ. दुबे ने बताया कि टीबी की सटीक पहचान के लिए बलगम जाँच, सीबी-नॉट (CBNAAT), जीन एक्सपर्ट, सीटी स्कैन और मरीज की सम्पूर्ण चिकित्सीय पृष्ठभूमि का मूल्यांकन अनिवार्य है। इन सभी जाँचों की पुष्टि के बाद ही इलाज शुरू किया जाना चाहिए।

टीबी के जीवाणु की प्रकृति और दवा प्रतिरोध

डॉ. दुबे ने बताया कि टीबी का जीवाणु चार्ल्स डार्विन के 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' सिद्धांत पर काम करता है — यानी बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढालने में सक्षम। टीबी के जीवाणु चार प्रकार के होते हैं: रैपिड ग्रोअर्स (तेजी से बढ़ने वाले), इंट्रासेलुलर (कोशिका के भीतर), सेल वॉल (कोशिका भित्ति पर) और डॉर्मेंट बेसिलाई (सुप्त जीवाणुओं का समूह)।

दवाओं से पहले तीन प्रकार के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, लेकिन चौथे — सुप्त समूह — पर दवाएँ बेअसर रहती हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर ये जीवाणु पुनः सक्रिय होकर पनपने लगते हैं। यदि मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) टीबी विकसित हो सकती है, और एमडीआर का इलाज भी अधूरा छोड़ने पर एक्सडीआर (XDR) टीबी जैसी अत्यंत गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसका उपचार करीब दो वर्ष तक चलता है।

उत्तर प्रदेश में टीबी की स्थिति

डॉ. दुबे के अनुसार, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल में हर महीने 150 से 200 नए टीबी मरीज और 2 से 3 एमडीआर टीबी के मामले सामने आते हैं। उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष 15 से 17 हजार एमडीआर टीबी के मरीज दर्ज होते हैं।

गौरतलब है कि समय पर पहचान और नियमित उपचार के कारण टीबी से ठीक होने की दर अब 90 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है और प्रति लाख आबादी पर मरीजों की संख्या भी घटकर 200 से नीचे आ गई है। एक अनुपचारित टीबी मरीज प्रतिवर्ष 15 अन्य लोगों को संक्रमित कर सकता है।

उत्तर प्रदेश में आगरा, फिरोजाबाद, कानपुर, वाराणसी, लखनऊ और प्रयागराज में टीबी के सबसे अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। गंदगी और नमी के कारण मलिन बस्तियों में टीबी का खतरा विशेष रूप से अधिक रहता है।

नई तकनीक और सरकारी सहायता

डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की पहचान के लिए अत्याधुनिक एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (EBUS) तकनीक से जाँच सुविधा शुरू हो चुकी है। श्वसन रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बताया कि इस प्रक्रिया में मरीज के मुँह के रास्ते एक पतली ट्यूब डालकर फेफड़ों के अंदर की लाइव तस्वीरें देखी जाती हैं — बिना किसी चीरे या सर्जरी के।

इस तकनीक की सहायता से टीबी, फेफड़ों के कैंसर और छाती में लिम्फ नोड्स से जुड़ी बीमारियों की प्रारंभिक स्तर पर सटीक पहचान संभव होगी। इसके अलावा, जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. ए.के. सिंघल ने बताया कि टीबी मरीजों को सरकार की ओर से पोषण सहायता के रूप में हर महीने ₹1,000 दिए जाते हैं।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब देश 2025 तक टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट संदेश है — सही जाँच, समय पर निदान और पूरा इलाज ही टीबी को जड़ से खत्म करने का एकमात्र रास्ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि CBNAAT जैसी सरकारी जाँच सुविधाएँ मुफ्त उपलब्ध हैं। आलोचकों का कहना है कि आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी पद्धति के चिकित्सकों द्वारा भी बिना पर्याप्त जाँच के टीबी की दवाएँ देना दवा प्रतिरोध को बढ़ावा दे सकता है। MDR टीबी के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य केवल इलाज की दर सुधारने से नहीं, बल्कि निदान की गुणवत्ता सुनिश्चित करने से ही हासिल होगा।
RashtraPress
24 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या केवल एक्स-रे से टीबी की पुष्टि हो सकती है?
नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 30% मामलों में अकेले एक्स-रे पर आधारित निदान गलत साबित होता है, क्योंकि फेफड़ों का कैंसर, गाँठ, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस के एक्स-रे टीबी जैसे दिख सकते हैं। सटीक निदान के लिए बलगम जाँच, CBNAAT, जीन एक्सपर्ट और सीटी स्कैन जरूरी हैं।
टीबी की सही पहचान के लिए कौन-कौन सी जाँचें जरूरी हैं?
डॉ. आशुतोष दुबे के अनुसार, टीबी की पुष्टि के लिए एक्स-रे के साथ बलगम जाँच, CBNAAT (CB-NAAT), जीन एक्सपर्ट, सीटी स्कैन और मरीज की सम्पूर्ण चिकित्सीय पृष्ठभूमि का मूल्यांकन अनिवार्य है। इन सभी जाँचों की पुष्टि के बाद ही इलाज शुरू होना चाहिए।
MDR टीबी क्या है और यह कैसे होती है?
मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (MDR) टीबी तब विकसित होती है जब मरीज बीच में दवा छोड़ देता है और टीबी के जीवाणु सामान्य दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष 15 से 17 हजार MDR टीबी के मामले दर्ज होते हैं, और इसका इलाज न होने पर XDR टीबी हो सकती है जिसका उपचार करीब दो वर्ष तक चलता है।
टीबी के लक्षण दिखने पर क्या करें?
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. ए.के. सिंघल के अनुसार, दो सप्ताह से अधिक समय तक खाँसी, बुखार, वजन कम होना, भूख न लगना या बलगम में खून आने जैसे लक्षण होने पर तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में टीबी की जाँच करानी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में यह जाँच और इलाज निःशुल्क उपलब्ध है।
EBUS तकनीक क्या है और यह टीबी निदान में कैसे मदद करती है?
एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (EBUS) एक आधुनिक जाँच प्रक्रिया है जिसमें बिना चीरे या सर्जरी के मरीज के मुँह के रास्ते पतली ट्यूब डालकर फेफड़ों के अंदर की लाइव तस्वीरें देखी जाती हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ में यह सुविधा शुरू हो चुकी है, जिससे टीबी, फेफड़ों के कैंसर और लिम्फ नोड्स की बीमारियों की प्रारंभिक स्तर पर सटीक पहचान संभव है।
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