सितारा देवी: 'कथक की रानी' जिन्हें 16 वर्ष की उम्र में टैगोर ने दी 'नृत्य सम्राज्ञी' की उपाधि
सारांश
मुख्य बातें
कथक नृत्य को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने वाली सितारा देवी का जन्म 8 नवंबर 1920 को कोलकाता के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 'कथक की रानी' के नाम से विख्यात इस महान नृत्यांगना ने 94 वर्ष की आयु तक घुंघरू बाँधे और भारतीय शास्त्रीय नृत्य को एक नई पहचान दी। 25 नवंबर 2014 को उनके निधन के बाद भी उनकी कला की गूँज भारतीय संस्कृति में अमर है।
बचपन और प्रारंभिक जीवन
सितारा देवी का वास्तविक नाम धनलक्ष्मी था और घर में उन्हें स्नेह से 'धन्नो' पुकारा जाता था। उनके पिता सुकदेव महाराज संस्कृत के विद्वान और कथक के गुरु थे, जबकि माँ मथुरा देवी पारंपरिक नृत्य की जानकार थीं। उस दौर में जब समाज में नृत्य को अच्छे घर की लड़कियों के लिए वर्जित माना जाता था, सितारा ने मात्र 10 वर्ष की आयु में अपना पहला पेशेवर प्रदर्शन दिया — यह साहस अपने आप में असाधारण था।
नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता से ग्रहण की। 12 वर्ष की उम्र तक वे मुंबई आ चुकी थीं। 16 वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्म 'नागिन' में पहली बार रजतपट पर नृत्य किया।
रवींद्रनाथ टैगोर की ऐतिहासिक उपाधि
सितारा देवी की प्रतिभा ने महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। जब वे केवल 16 वर्ष की थीं, टैगोर ने उनका नृत्य देखने के बाद उन्हें 'नृत्य सम्राज्ञी' की उपाधि से नवाज़ा — एक ऐसा सम्मान जो किसी भी कलाकार के लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि सितारा की कला में बचपन से ही असाधारण परिपक्वता थी।
फिल्मी करियर और कला की साधना
सितारा देवी ने अपने करियर में 100 से अधिक फिल्मों में नृत्य किया। 'शहर का जादू', 'आवारा', 'मदर इंडिया', 'अनजाना' और 'हरे राम हरे कृष्ण' जैसी कालजयी फिल्मों में उनके नृत्य आज भी दर्शकों को भावविभोर करते हैं। उनके लिए नृत्य महज एक पेशा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना था। 94 वर्ष की आयु में भी वे मंच पर लगातार 45 मिनट तक नृत्य करने में सक्षम थीं — एक ऐसा तथ्य जो उनकी अनुशासन और समर्पण की गवाही देता है। उनकी अंतिम सार्वजनिक प्रस्तुति 2013 में मुंबई में हुई थी।
व्यक्तिगत जीवन
रिपोर्टों के अनुसार, सितारा देवी का व्यक्तिगत जीवन भी उनकी कला जितना ही बेबाक और अपरंपरागत रहा। कथित तौर पर उन्होंने चार विवाह किए। पहला विवाह 8 वर्ष की बाल आयु में श्री देसाई से हुआ, जिसे उन्होंने स्वयं समाप्त किया। दूसरा विवाह अभिनेता नजीर अहमद खान से हुआ, जिसके लिए उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया, किंतु यह संबंध भी तलाक में समाप्त हुआ। तीसरा विवाह प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता के. आसिफ से हुआ, जो भी अधिक समय नहीं चला। चौथा और अंतिम विवाह उन्होंने गुजराती व्यवसायी प्रताप बारोट से किया।
पुरस्कार और विरासत
भारतीय शास्त्रीय नृत्य में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सितारा देवी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और कालिदास सम्मान से सम्मानित किया गया। हालाँकि, उनका एक प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है — जब भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण देने का प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि उनका योगदान इस सम्मान से कहीं बड़ा है और उन्होंने 'भारत रत्न' की माँग की। यह घटना उनके आत्मविश्वास और कला के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाती है।
गौरतलब है कि सितारा देवी ऐसे युग में कथक को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रही थीं जब भारतीय शास्त्रीय नृत्य को मुख्यधारा में स्थापित करना एक संघर्ष था। उनकी विरासत आज भी देश-विदेश में कथक के हर विद्यार्थी की प्रेरणा बनी हुई है।