सुधांशु त्रिवेदी का विपक्ष पर हमला: नेतृत्व और जमीन का संबंध
सारांश
Key Takeaways
- सुधांशु त्रिवेदी का विपक्ष पर सीधा हमला।
- नक्सल विरोधी अभियानों में सुरक्षा बलों की सफलता।
- जमीन से जुड़ा नेतृत्व का महत्व।
- विपक्ष की जमीनी हकीकत से दूरी।
- नक्सलियों के प्रति सख्ती की आवश्यकता।
नई दिल्ली, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा में सोमवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने सुरक्षा बलों के मनोबल पर चर्चा की और नक्सल विरोधी अभियानों तथा सरकार की नीतियों का समर्थन किया।
सुधांशु त्रिवेदी ने पिछले वर्ष फरवरी में छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा पर कोरगुट्टा पहाड़ी में किए गए एक महत्वपूर्ण नक्सल विरोधी अभियान का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यह अभियान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और राज्य पुलिस का संयुक्त प्रयास था, जो 21 दिनों तक चला और इसमें 31 नक्सली मारे गए। उन्होंने कहा कि इस दौरान सीआरपीएफ के महानिदेशक स्वयं मौके पर उपस्थित थे, जो यह दर्शाता है कि वर्तमान सरकार में नेतृत्व जमीन से जुड़ा हुआ है। इसके साथ ही, उन्होंने विपक्ष पर जमीन से कटे होने का आरोप लगाया।
सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि विपक्ष के नेता जमीनी हकीकत से दूर रहकर अक्सर विदेशों में अधिक समय बिताते हैं, जिसके कारण उन्हें धरातल की सही समझ नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा और प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष की समझ सीमित है। उन्होंने नक्सल विरोधी अभियानों का जिक्र करते हुए कहा कि 2024 में छत्तीसगढ़ के कांकेर में एक मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए थे, लेकिन कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे फर्जी करार दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयानों से सुरक्षा बलों का मनोबल कमजोर होता है। उन्होंने वर्ष 2010 में हुए दंतेवाड़ा नक्सली हमले का उल्लेख किया, जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे, और कहा कि उस समय भी कुछ जगहों पर जश्न मनाए जाने की खबरें आई थीं, जो कि अत्यंत दुखद थीं।
सांसद ने कहा कि पहले की सरकारों के समय नक्सलियों के प्रति नरम रुख अपनाया जाता था, लेकिन अब केंद्रीय गृहमंत्री के नेतृत्व में सरकार सख्ती से नक्सलवाद का मुकाबला कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अब नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए उन्हें हथियार छोड़ने होंगे और अपनी विचारधारा में बदलाव लाना होगा। उन्होंने इसे पूर्व की सरकारों की तुलना में राष्ट्रीय सुरक्षा की सोच और नेतृत्व का अंतर बताया। उन्होंने वर्ष 2019 में हुए पुलवामा हमले और उसके बाद की कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ने सख्त जवाब दिया, जिससे देश की सुरक्षा नीति में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है।
साथ ही उन्होंने कहा कि आज नक्सल प्रभावित क्षेत्रों जैसे बस्तर में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जहाँ बड़े पैमाने पर खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के कांगेर जिले में एक मुठभेड़ हुई थी, जिसमें 29 नक्सली मारे गए। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं ने और वहां के पूर्व मुख्यमंत्री ने ये कह दिया था कि ये तो गरीब आदिवासी थे, मुठभेड़ फर्जी थी। लेकिन दो दिन बाद नक्सली संगठनों ने प्रेस रिलीज जारी कर दी कि मुठभेड़ में उनके लोग मारे गए हैं।
भाजपा सांसद ने कहा कि ये अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि इस तरह के संवेदनशील विषय पर केंद्रीय सुरक्षा बलों के मोराल व मनोदशा के ऊपर राजनीति की जाती है। ऐसी राजनीति से बचने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमारे सेंट्रल पैरामिलिटरी फोर्सेज का मनोबल बढ़ाया है। सुकमा जिले में एक जगह है चिंता गुफा, जहाँ ये माना जाता था, नक्सल कहते थे, हियर गवर्नमेंट डजन्ट एग्जिस्ट।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चिंता गुफा में दौरा करके दिखा दिया कि जहाँ जहाँ पर सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्सेज पोस्टेड हैं, उनके मोराल के लिए काम करेंगे। अब गृहमंत्री अमित शाह के आने के बाद उस इलाके का वातावरण बदला हुआ दिखाई पड़ता है। वो बस्तर, जहाँ कभी नक्सली घटनाएँ होती थीं, आज 2024 और 2025 में बस्तर में ओलंपिक करके दिखा दिया। उन्होंने कहा कि इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस भारत तिब्बत सीमा पुलिस ये नाम याद दिलाता है कि जब भारत आजाद हुआ तो भारत की सीमा तिब्बत से मिलती थी, चीन से नहीं मिलती थी। भारत तिब्बत सीमा पुलिस उस बात का प्रमाण है।