8 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को प्रकाश सिंह फैसले के विपरीत माना, डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस

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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को प्रकाश सिंह फैसले के विपरीत माना, डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को प्रथम दृष्टया 'प्रकाश सिंह' फैसले के विपरीत मानते हुए मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस दिया है। यह मामला राज्यों में पुलिस सुधारों के अनुपालन पर एक बड़े टकराव की ओर इशारा करता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली को प्रथम दृष्टया 'प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ' मामले के निर्देशों के विपरीत माना।
मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी; नियम रद्द हुआ तो उनकी नियुक्ति भी निरस्त हो सकती है।
विवादित नियमावली 8 जनवरी 2025 को अधिसूचित; नियुक्ति से एक दिन पहले 29 दिसंबर 2025 को छह महीने की न्यूनतम सेवा शर्त हटाई गई थी।
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और झारखंड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए।
अदालत ने झारखंड सरकार को नियमावली पर पुनर्विचार की छूट दी; अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित।

सर्वोच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को झारखंड की पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) नियुक्ति नियमावली के एक प्रमुख प्रावधान को प्रथम दृष्टया 'प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ' मामले में तय कानून के सीधे विपरीत करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि यह नियमावली रद्द की जाती है, तो वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी स्वतः निरस्त हो सकती है। न्यायालय ने तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का अवसर देते हुए उन्हें नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर झारखंड की 'डीजीपी और पुलिस महानिरीक्षक (पुलिस बल के प्रमुख) के चयन एवं नियुक्ति विनियमन, 2025' की वैधता को चुनौती दी है। यह नियमावली 8 जनवरी 2025 को अधिसूचित की गई थी। केंद्र का आरोप है कि इसे सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बिना बनाया गया और इसमें प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया।

मुख्य न्यायिक घटनाक्रम

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने गुरुवार को सुनवाई की। झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार के प्रावधान हैं, तो केंद्र केवल झारखंड की नियमावली को ही क्यों चुनौती दे रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में तो इससे भी अधिक गंभीर प्रावधान मौजूद हैं।

इस पर केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि केंद्र किसी एक राज्य को लक्षित नहीं कर रहा। उन्होंने कहा कि यदि अन्य राज्यों में भी ऐसी नियमावलियाँ हैं, तो उन्हें भी हटाया जाना चाहिए।

विवादित नियुक्तियों का विवरण

केंद्र ने झारखंड के पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता की नियुक्ति पर भी आपत्ति जताई है। अनुराग गुप्ता को 2 फरवरी 2025 को डीजीपी नियुक्त किया गया था, जबकि उस समय उनकी सेवा में लगभग तीन महीने शेष थे और वे 30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त होने वाले थे।

तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को डीजीपी नियुक्त किया गया, जबकि उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर 2025 को थी। उल्लेखनीय है कि नियुक्ति से ठीक एक दिन पहले — 29 दिसंबर 2025 को — राज्य सरकार ने नियम में संशोधन कर डीजीपी नियुक्ति के लिए छह महीने की न्यूनतम शेष सेवा की अनिवार्य शर्त हटा दी थी। केंद्र ने इसी नियुक्ति को प्रकाश सिंह मामले के निर्देशों के विपरीत बताते हुए न्यायालय में चुनौती दी है।

अदालत का रुख और राज्य को राहत

सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड सरकार को संबंधित नियमावली पर पुनर्विचार की छूट दी है। राज्य सरकार चाहे तो अपना जवाब दाखिल कर सकती है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद के लिए निर्धारित की है, जिसमें तदाशा मिश्रा अपना पक्ष रख सकेंगी और झारखंड सरकार संबंधित नियम पर जवाब दाखिल कर सकेगी।

आगे क्या होगा

यह मामला देशभर में डीजीपी नियुक्ति की प्रक्रिया पर दूरगामी असर डाल सकता है। प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही पुलिस सुधारों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनका पालन अनेक राज्यों में अब भी अधूरा है। यह सुनवाई ऐसे समय में आई है जब राज्यों और केंद्र के बीच पुलिस नियुक्तियों पर तनाव बढ़ता जा रहा है। अगली तारीख पर न्यायालय का रुख तय करेगा कि झारखंड की नियमावली और वर्तमान डीजीपी की नियुक्ति का भविष्य क्या होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि न्यायिक निर्देशों की खुली अनदेखी की श्रेणी में आता है। असली सवाल यह है कि जब कपिल सिब्बल ने अन्य राज्यों का हवाला दिया, तो अदालत का जवाब क्या होगा — क्या वह केवल झारखंड को दंडित करेगी, या पुलिस सुधारों का राष्ट्रव्यापी ऑडिट शुरू होगा? अगली सुनवाई की तारीख पुलिस स्वायत्तता बनाम राजनीतिक नियंत्रण की उस पुरानी जंग में एक नई कड़ी जोड़ेगी।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली पर क्या कहा?
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया माना कि झारखंड की डीजीपी नियुक्ति नियमावली का संबंधित प्रावधान 'प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ' मामले में तय कानून के सीधे विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियम रद्द होने पर मौजूदा डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी निरस्त हो सकती है।
डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति विवादित क्यों है?
तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को डीजीपी नियुक्त किया गया, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति 31 दिसंबर 2025 को थी। नियुक्ति से एक दिन पहले राज्य सरकार ने नियमावली में संशोधन कर छह महीने की न्यूनतम शेष सेवा की शर्त हटा दी थी, जिसे केंद्र ने 'प्रकाश सिंह' निर्देशों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी है।
'प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ' मामला क्या है और यह डीजीपी नियुक्ति से कैसे जुड़ा है?
यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला है जिसमें पुलिस सुधारों के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए गए थे, जिनमें डीजीपी की नियुक्ति प्रक्रिया भी शामिल है। केंद्र का आरोप है कि झारखंड की नियमावली इन निर्देशों का पालन किए बिना बनाई गई, जो अदालत की अवमानना के समान है।
इस मामले में केंद्र और झारखंड सरकार के बीच मुख्य विवाद क्या है?
केंद्र का कहना है कि झारखंड ने सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना डीजीपी नियुक्ति नियमावली बनाई और 'प्रकाश सिंह' निर्देशों का उल्लंघन किया। झारखंड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि अन्य राज्यों में भी इसी तरह के या अधिक गंभीर प्रावधान हैं, इसलिए केवल झारखंड को निशाना बनाना उचित नहीं।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी और अब क्या होगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। इस दौरान डीजीपी तदाशा मिश्रा अपना पक्ष रख सकती हैं और झारखंड सरकार नियमावली पर जवाब दाखिल कर सकती है। अदालत ने राज्य को संबंधित नियम पर पुनर्विचार का अवसर भी दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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