झारखंड हाईकोर्ट का डीजीपी तदाशा मिश्रा को अवमानना नोटिस, थानों में CCTV न लगाना पड़ा भारी
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड हाईकोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तदाशा मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है — यह पूछते हुए कि उनके विरुद्ध अदालती आदेश की अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। अदालत की नाराज़गी की वजह है राज्य के सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के बार-बार दिए गए निर्देशों का अब तक पालन न होना। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस अधिकारियों की रुचि यह सुनिश्चित करने में है कि थानों में कैमरे न लगें।
मुख्य घटनाक्रम
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 18 जून 2026 के आदेश और उससे पहले विभिन्न पीठों द्वारा दिए गए निर्देशों के बावजूद किसी भी पुलिस थाने में सीसीटीवी लगाने की दिशा में प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। अदालत ने कहा कि 18 जून को ही डीजीपी के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी करने पर विचार किया गया था, लेकिन उस समय राज्य सरकार को एक और अवसर देते हुए अनुपालन का मौका दिया गया था।
गौरतलब है कि यह मामला केवल तकनीकी चूक का नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों की सुनियोजित अनदेखी का है — जो न्यायपालिका की नज़र में गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है।
सरकार के दिए गए कारण और अदालत की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार की ओर से पहले टेंडर जारी करने और बाद में उसे रद्द करने समेत कई स्पष्टीकरण दिए जाते रहे हैं। खंडपीठ ने इन कारणों को प्रथम दृष्टया असंतोषजनक करार दिया। अदालत ने कहा कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद अनुपालन न होना गंभीर विषय है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
मुख्य सचिव और गृह सचिव को भी निर्देश
इससे पहले अदालत ने मुख्य सचिव और गृह सचिव को भी निर्देश दिया था कि वे डीजीपी को आदेश की गंभीरता से अवगत कराएँ और अनुपालन सुनिश्चित करें। इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं आया, जिसे अदालत ने अत्यंत गंभीरता से लिया है।
यह ऐसे समय में आया है जब पुलिस हिरासत में पारदर्शिता और मानवाधिकार सुरक्षा को लेकर देशभर में बहस तेज़ है। सर्वोच्च न्यायालय भी अपने पूर्व के निर्देशों में थानों में सीसीटीवी को अनिवार्य बता चुका है।
आगे क्या होगा
मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर 2026 को निर्धारित है, जब डीजीपी तदाशा मिश्रा को अपना जवाब दाखिल करना होगा। यदि अदालत उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, तो औपचारिक अवमानना कार्यवाही शुरू की जा सकती है — जो झारखंड पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है।