सुप्रीम कोर्ट का केंद्र, दिल्ली सरकार और पुलिस को नोटिस; त्योहारी सीजन में सेंट्रल दिल्ली में धरने पर रोक की मांग
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 3 नवंबर 2026 को दिल्ली के व्यापारियों की संस्था किराना कमेटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। याचिका में त्योहारी सीजन के दौरान सेंट्रल दिल्ली में धरना-प्रदर्शन पर अस्थायी रोक लगाने की मांग की गई है। व्यापारियों का कहना है कि इन प्रदर्शनों से ₹2,000 करोड़ से अधिक का व्यावसायिक नुकसान हो चुका है।
व्यापारियों के वकील की दलीलें
व्यापारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि जंतर-मंतर और रामलीला मैदान जैसे विरोध-स्थल आज के शहरी परिवेश के लिए अनुपयुक्त हो चुके हैं। उन्होंने तर्क दिया, 'आज हम इन जगहों से लगभग 80 साल आगे आ चुके हैं। रामलीला मैदान कनॉट प्लेस (CP) से मात्र 1 मील दूर है, और उस इलाके में 50 लाख लोग रहते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि त्योहारों के सीजन में बिक्री न हो, तो व्यापारियों की आमदनी गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
रोहतगी ने अगले 2 महीनों तक किसी भी विरोध-प्रदर्शन या धरने पर रोक लगाने की अपील की और नए सिरे से किसी वैकल्पिक समाधान की माँग की।
सॉलिसिटर जनरल और विपक्ष की प्रतिक्रिया
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जो भी संगठन 'बंद' का आह्वान करता है, उसे उसकी जिम्मेदारी भी लेनी होगी। उन्होंने बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को प्रदर्शन की अनुमति सिर्फ 1 दिन के लिए दी गई थी, लेकिन संगठन ने 17 दिनों तक उस स्थान पर कब्जा बनाए रखा और बिना अनुमति के संसद की ओर मार्च भी किया।
विपक्ष की ओर से वकील हरिहरन ने पलटवार करते हुए कहा कि यह एक अधिसूचित प्रदर्शन-स्थल है और अब इससे भी आपत्ति जताई जा रही है — जो संवैधानिक अधिकारों को संकुचित करने का प्रयास है।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियाँ
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि जिन संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं, उन्हें भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाए, क्योंकि उनके जवाब के बिना कोई भी अदालत निर्णय नहीं ले सकती। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन की अनुमति देने या न देने संबंधी आदेश में स्पष्ट कारण दर्ज होने चाहिए।
CJI ने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी निर्धारित प्रदर्शन-स्थल पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं कर सकता, क्योंकि उस स्थान पर प्रदर्शन का अधिकार सभी को समान रूप से मिला हुआ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूछा, 'यदि किसान भी विरोध-प्रदर्शन करना चाहें, तो वे कहाँ जाएँगे?' सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वकीलों के एक-दूसरे को बीच में टोकने के तरीके पर नाराजगी जताई और कहा कि अदालत को 'फिश मार्केट' न बनाएं।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। यह ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में त्योहारी सीजन अपने चरम पर है और व्यापारी पहले से ही आर्थिक दबाव में हैं। गौरतलब है कि यह मामला विरोध के संवैधानिक अधिकार और नागरिक जीवन की सहजता के बीच लंबे समय से चली आ रही कानूनी बहस को फिर से सामने लाता है।