सुप्रीम कोर्ट ने देहरादून जिम संचालक मोहम्मद दीपक के खिलाफ FIR कार्यवाही पर लगाई रोक, उत्तराखंड सरकार से माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 31 अगस्त को देहरादून के जिम संचालक दीपक कुमार उर्फ मोहम्मद दीपक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में आगे की समस्त कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी। यह मामला 26 जनवरी को देहरादून में एक मुस्लिम दुकानदार के कथित उत्पीड़न की घटना से जुड़ा है, जिसमें दीपक का नाम भी आरोपी के रूप में दर्ज किया गया था।
मुख्य घटनाक्रम
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मोहम्मद दीपक की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि 'संबंधित एफआईआर की कार्यवाही और हाईकोर्ट के आदेश का असर और अमल रुका रहेगा।' साथ ही अदालत ने उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट के आदेश पर भी रोक
सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसके तहत दीपक को इस घटना से जुड़े किसी भी वीडियो या संदेश को सोशल मीडिया पर साझा करने से प्रतिबंधित किया गया था। उच्च न्यायालय ने यह प्रतिबंध इस आशंका के चलते लगाया था कि सोशल मीडिया पर टिप्पणियों से चल रही पुलिस जाँच प्रभावित हो सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 26 जनवरी को देहरादून में उस समय शुरू हुआ जब कथित तौर पर बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं ने एक मुस्लिम दुकानदार द्वारा अपनी दुकान के नाम में 'बाबा' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। मोहम्मद दीपक का कहना है कि वह उस दुकानदार की मदद के लिए मौके पर पहुँचा था, जहाँ बजरंग दल के कुछ सदस्यों से उसका टकराव हो गया। इसके बाद उसके खिलाफ भी आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया।
हाईकोर्ट में चुनौती और इनकार
दीपक ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। मार्च में उच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए पुलिस जाँच जारी रखने की अनुमति दे दी। इसके बाद दीपक ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के इस अंतरिम आदेश से दीपक को फिलहाल गिरफ्तारी और जाँच की तात्कालिक कार्यवाही से राहत मिली है। उत्तराखंड सरकार का जवाब आने के बाद अदालत इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख तय करेगी। यह मामला धार्मिक पहचान, सामुदायिक तनाव और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग के आरोपों से जुड़े व्यापक सवाल उठाता है, जिन पर न्यायालय का अंतिम निर्णय महत्वपूर्ण होगा।