4 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

तमिलनाडु विधानसभा ने मेकेदातु बांध के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया, केंद्र से मंजूरी न देने की माँग

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
तमिलनाडु विधानसभा ने मेकेदातु बांध के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया, केंद्र से मंजूरी न देने की माँग

सारांश

तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से मेकेदातु बांध के खिलाफ प्रस्ताव पास कर केंद्र से ₹9,000 करोड़ की परियोजना रोकने की माँग की। इस मुद्दे ने कांग्रेस में भी फूट डाली — कर्नाटक सरकार परियोजना के पक्ष में, तमिलनाडु के कांग्रेस नेता विरोध में।

मुख्य बातें

तमिलनाडु विधानसभा ने 19 जून 2026 को मेकेदातु बांध परियोजना के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।
जोसेफ विजय ने प्रस्ताव पेश किया; केंद्र सरकार और केंद्रीय जल आयोग से DPR को मंजूरी न देने का आग्रह किया।
कर्नाटक की प्रस्तावित परियोजना की अनुमानित लागत ₹9,000 करोड़ है; इसका लक्ष्य बेंगलुरु को पेयजल और 400 मेगावाट जलविद्युत ऊर्जा देना है।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय कावेरी बेसिन को 'कमी वाला बेसिन' घोषित कर चुके हैं — नई परियोजना इस निर्णय के विपरीत बताई जा रही है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस में आंतरिक विभाजन उजागर — कर्नाटक की कांग्रेस सरकार परियोजना के पक्ष में, तमिलनाडु के कांग्रेस नेता विरोध में।
मुख्यमंत्री विजय पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर DPR खारिज करने की माँग कर चुके हैं।

तमिलनाडु विधानसभा ने शुक्रवार, 19 जून 2026 को सर्वसम्मति से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का कड़ा विरोध किया गया। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया कि वह इस ₹9,000 करोड़ की संतुलन जलाशय परियोजना को किसी भी रूप में मंजूरी न दे।

मुख्य घटनाक्रम

सदन में प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कहा कि तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा राजनीतिक मतभेदों से ऊपर है। उन्होंने राज्य के किसानों और आम जनता के हितों की रक्षा के लिए एकजुटता का आह्वान किया। विजय ने सदन को संबोधित करते हुए कहा, 'जल हमारा मूलभूत अधिकार और संसाधन है। इसकी रक्षा की जिम्मेदारी हम सभी की है। राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जब बात हमारी जनता और किसानों के कल्याण की आती है, तो हमें एकजुट रहना चाहिए।'

तमिलनाडु की कानूनी दलीलें

प्रस्ताव में तर्क दिया गया कि कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय दोनों स्पष्ट रूप से यह स्थापित कर चुके हैं कि कावेरी बेसिन एक 'कमी वाला बेसिन' है, जिसमें उपलब्ध जल पहले से ही तटवर्ती राज्यों के बीच आवंटित किया जा चुका है। इसके आधार पर प्रस्ताव में कहा गया कि बेसिन में कोई भी नई परियोजना शुरू नहीं की जा सकती जिससे आवंटित हिस्से से अधिक जल का उपयोग या भंडारण हो सके। विधानसभा ने केंद्रीय जल आयोग से भी आग्रह किया कि वह कर्नाटक की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को संसाधित या अनुमोदित न करे।

कर्नाटक का पक्ष और विवाद की जड़

कर्नाटक लगातार यह तर्क देता रहा है कि मेकेदातु परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य बेंगलुरु की बढ़ती पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना और 400 मेगावाट जलविद्युत ऊर्जा उत्पन्न करना है। वहीं, तमिलनाडु की आशंका है कि कावेरी पर किसी भी नए जलाशय के निर्माण से निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। गौरतलब है कि यह विवाद दशकों पुराना है और दोनों राज्यों के बीच कावेरी जल बँटवारे को लेकर कानूनी लड़ाई सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच चुकी है।

कांग्रेस में आंतरिक फूट

इस मुद्दे ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) के भीतर भी स्पष्ट विभाजन उजागर किया है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मेकेदातु परियोजना का समर्थन कर रही है, जबकि तमिलनाडु के कांग्रेस नेता TVK के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के विरोध के साथ खड़े हैं। यह स्थिति पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक असहज अंतर्विरोध पैदा करती है।

आगे क्या होगा

इससे पहले मुख्यमंत्री विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कर्नाटक की DPR को खारिज करने की माँग की थी और यह रेखांकित किया था कि निचले राज्यों की सहमति के बिना कावेरी पर कोई नया जलाशय नहीं बनाया जाना चाहिए। अब विधानसभा के सर्वसम्मत प्रस्ताव के बाद यह मामला केंद्र सरकार के समक्ष और अधिक दबाव के साथ उठेगा। कावेरी जल पर निर्भर किसानों की आजीविका और दोनों राज्यों के बीच जल-राजनीति का यह अध्याय निकट भविष्य में और गहरा होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि केंद्र सरकार इस दबाव के आगे कितना झुकेगी — खासकर तब, जब कर्नाटक में भी उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी है। कावेरी विवाद दशकों से न्यायालयों और न्यायाधिकरणों के बीच घूमता रहा है, फिर भी जमीनी समाधान नहीं निकला। इस प्रस्ताव में सबसे उल्लेखनीय पहलू कांग्रेस की आंतरिक फूट है — एक ही पार्टी दो राज्यों में परस्पर विरोधी रुख अपना रही है, जो राष्ट्रीय जल नीति पर किसी भी सर्वदलीय सहमति की राह को और कठिन बनाती है।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेकेदातु बांध परियोजना क्या है और इसे लेकर विवाद क्यों है?
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक संतुलन जलाशय है, जिसकी अनुमानित लागत ₹9,000 करोड़ है। कर्नाटक का कहना है कि यह बेंगलुरु की पेयजल जरूरतें पूरी करेगी और 400 मेगावाट बिजली पैदा करेगी, जबकि तमिलनाडु को आशंका है कि इससे निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता घटेगी।
तमिलनाडु विधानसभा ने प्रस्ताव में केंद्र से क्या माँगें रखी हैं?
विधानसभा ने केंद्र सरकार से मेकेदातु परियोजना को किसी भी प्रकार की मंजूरी न देने और केंद्रीय जल आयोग से कर्नाटक की DPR को संसाधित या अनुमोदित न करने का आग्रह किया है। साथ ही, केंद्र से कहा गया है कि वह कर्नाटक को परियोजना आगे न बढ़ाने की सलाह दे।
कावेरी जल विवाद पर न्यायालयों का क्या रुख रहा है?
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने स्पष्ट किया है कि कावेरी बेसिन एक 'कमी वाला बेसिन' है और उपलब्ध जल तटवर्ती राज्यों में पहले से आवंटित है। तमिलनाडु का तर्क है कि इस आधार पर बेसिन में कोई नई परियोजना नहीं बनाई जा सकती।
इस मुद्दे पर कांग्रेस में क्या विभाजन है?
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मेकेदातु परियोजना का समर्थन कर रही है, जबकि तमिलनाडु के कांग्रेस नेता TVK नेतृत्व वाली राज्य सरकार के विरोध के साथ खड़े हैं। यह अंतर्विरोध पार्टी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक असहज स्थिति पैदा करता है।
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने इससे पहले क्या कदम उठाए थे?
मुख्यमंत्री विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कर्नाटक की DPR को खारिज करने की माँग की थी। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि निचले राज्यों की सहमति के बिना कावेरी नदी पर कोई नया जलाशय नहीं बनाया जाना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 6 दिन पहले
  2. 6 दिन पहले
  3. 6 दिन पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 2 महीने पहले
  8. 2 महीने पहले