कावेरी जल विवाद: मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव दिया, मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के अधिकारों की रक्षा की मांग
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना और तमिलनाडु के जल अधिकारों पर तत्काल चर्चा की मांग की। उन्होंने सदन की कार्यवाही रोककर इस मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि कावेरी नदी तमिलनाडु की जीवनरेखा है और इससे जुड़ा हर निर्णय लाखों किसानों और करोड़ों नागरिकों के भविष्य को सीधे प्रभावित करता है।
स्थगन प्रस्ताव की पृष्ठभूमि
लोकसभा सचिवालय को भेजे गए इस प्रस्ताव में टैगोर ने कहा कि कावेरी डेल्टा की कृषि व्यवस्था और पेयजल आपूर्ति पूरी तरह इस नदी पर निर्भर है। उनके अनुसार, ऊपरी बेसिन में कोई भी बांध, जलाशय या अन्य निर्माण — जो नदी के प्रवाह को प्रभावित करे — तमिलनाडु के किसानों की आजीविका पर सीधा आघात करेगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि तमिलनाडु के किसान कई दशकों से इस विवाद के कारण अनिश्चितता में जीने को मजबूर हैं।
जलशक्ति मंत्रालय के जवाब पर आपत्ति
टैगोर ने कहा कि हाल ही में जलशक्ति राज्य मंत्री द्वारा संसद में दिया गया जवाब तमिलनाडु के लोगों के लिए गहरी चिंता और निराशा का विषय बना है। मंत्री ने संसद में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कर्नाटक को कावेरी पर निर्माण के लिए निचले प्रवाह वाले राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य नहीं बताया गया है। सांसद ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार का यह रुख तमिलनाडु की वैध और संवैधानिक चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
कानूनी अधिकारों की दलील
प्रस्ताव में टैगोर ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल सहमति या अनुमति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के उस फैसले के पूर्ण पालन का है, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित किया था। उन्होंने तर्क दिया कि किसी अंतरराज्यीय नदी पर कोई भी राज्य एकतरफा ऐसा कदम नहीं उठा सकता जो दूसरे राज्य के कानूनी हिस्से को कम करे। उनके अनुसार, यह तमिलनाडु का संवैधानिक अधिकार है कि वह ऐसी किसी भी परियोजना का विरोध करे जो उसके निर्धारित जल हिस्से को प्रभावित करती हो।
केंद्र सरकार से चार प्रमुख मांगें
टैगोर ने स्थगन प्रस्ताव में केंद्र सरकार के समक्ष चार ठोस मांगें रखीं। पहली, केंद्र तत्काल स्पष्ट करे कि वह कावेरी बेसिन में तमिलनाडु के हितों की रक्षा कैसे करेगा। दूसरी, ऐसी किसी परियोजना को मंजूरी न दी जाए जो न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के क्रियान्वयन पर असर डाले। तीसरी, मेकेदातु परियोजना पर कोई अंतिम निर्णय लेने से पहले तमिलनाडु की सभी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार किया जाए। चौथी, केंद्र सरकार एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की भूमिका निभाते हुए सभी राज्यों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करे।
संघीय व्यवस्था पर सवाल
सांसद ने आरोप लगाया कि केंद्र के मौजूदा रुख से तमिलनाडु में यह धारणा बनी है कि किसानों की चिंताओं की अनदेखी की जा रही है और केंद्र संघीय ढाँचे में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने में विफल रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का दायित्व है कि वह राज्यों के बीच असंतुलन पैदा करने वाले किसी भी कदम से बचे और संवैधानिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बनाए रखे। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब दक्षिण भारत के कई राज्यों में केंद्र-राज्य जल संबंधों को लेकर तनाव पहले से बढ़ा हुआ है।