29 जुलाई 2026
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कावेरी जल विवाद: मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव दिया, मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के अधिकारों की रक्षा की मांग

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कावेरी जल विवाद: मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव दिया, मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के अधिकारों की रक्षा की मांग

सारांश

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव देकर मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा की मांग की। जलशक्ति मंत्रालय के जवाब को 'चिंताजनक' बताते हुए उन्होंने केंद्र से चार ठोस कदम उठाने की अपील की — जिसमें परियोजना पर रोक और न्यायाधिकरण के फैसले का पूर्ण पालन शामिल है।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में कावेरी जल विवाद पर स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया।
प्रस्ताव मेकेदातु परियोजना और तमिलनाडु के निर्धारित जल हिस्से की सुरक्षा पर केंद्रित है।
जलशक्ति राज्य मंत्री के संसदीय जवाब — जिसमें कर्नाटक को निचले राज्यों की सहमति की अनिवार्यता नहीं बताई गई — पर कड़ी आपत्ति जताई गई।
टैगोर ने केंद्र से चार मांगें रखीं: तमिलनाडु के हितों की स्पष्ट रक्षा, मेकेदातु पर रोक, आपत्तियों पर विचार और निष्पक्ष संघीय भूमिका।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले — जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित किया था — के पूर्ण पालन की माँग की गई।

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस देकर कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना और तमिलनाडु के जल अधिकारों पर तत्काल चर्चा की मांग की। उन्होंने सदन की कार्यवाही रोककर इस मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आग्रह किया, यह कहते हुए कि कावेरी नदी तमिलनाडु की जीवनरेखा है और इससे जुड़ा हर निर्णय लाखों किसानों और करोड़ों नागरिकों के भविष्य को सीधे प्रभावित करता है।

स्थगन प्रस्ताव की पृष्ठभूमि

लोकसभा सचिवालय को भेजे गए इस प्रस्ताव में टैगोर ने कहा कि कावेरी डेल्टा की कृषि व्यवस्था और पेयजल आपूर्ति पूरी तरह इस नदी पर निर्भर है। उनके अनुसार, ऊपरी बेसिन में कोई भी बांध, जलाशय या अन्य निर्माण — जो नदी के प्रवाह को प्रभावित करे — तमिलनाडु के किसानों की आजीविका पर सीधा आघात करेगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि तमिलनाडु के किसान कई दशकों से इस विवाद के कारण अनिश्चितता में जीने को मजबूर हैं।

जलशक्ति मंत्रालय के जवाब पर आपत्ति

टैगोर ने कहा कि हाल ही में जलशक्ति राज्य मंत्री द्वारा संसद में दिया गया जवाब तमिलनाडु के लोगों के लिए गहरी चिंता और निराशा का विषय बना है। मंत्री ने संसद में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कर्नाटक को कावेरी पर निर्माण के लिए निचले प्रवाह वाले राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य नहीं बताया गया है। सांसद ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार का यह रुख तमिलनाडु की वैध और संवैधानिक चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता।

कानूनी अधिकारों की दलील

प्रस्ताव में टैगोर ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल सहमति या अनुमति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के उस फैसले के पूर्ण पालन का है, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधित किया था। उन्होंने तर्क दिया कि किसी अंतरराज्यीय नदी पर कोई भी राज्य एकतरफा ऐसा कदम नहीं उठा सकता जो दूसरे राज्य के कानूनी हिस्से को कम करे। उनके अनुसार, यह तमिलनाडु का संवैधानिक अधिकार है कि वह ऐसी किसी भी परियोजना का विरोध करे जो उसके निर्धारित जल हिस्से को प्रभावित करती हो।

केंद्र सरकार से चार प्रमुख मांगें

टैगोर ने स्थगन प्रस्ताव में केंद्र सरकार के समक्ष चार ठोस मांगें रखीं। पहली, केंद्र तत्काल स्पष्ट करे कि वह कावेरी बेसिन में तमिलनाडु के हितों की रक्षा कैसे करेगा। दूसरी, ऐसी किसी परियोजना को मंजूरी न दी जाए जो न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के क्रियान्वयन पर असर डाले। तीसरी, मेकेदातु परियोजना पर कोई अंतिम निर्णय लेने से पहले तमिलनाडु की सभी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार किया जाए। चौथी, केंद्र सरकार एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की भूमिका निभाते हुए सभी राज्यों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करे।

संघीय व्यवस्था पर सवाल

सांसद ने आरोप लगाया कि केंद्र के मौजूदा रुख से तमिलनाडु में यह धारणा बनी है कि किसानों की चिंताओं की अनदेखी की जा रही है और केंद्र संघीय ढाँचे में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने में विफल रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का दायित्व है कि वह राज्यों के बीच असंतुलन पैदा करने वाले किसी भी कदम से बचे और संवैधानिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बनाए रखे। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब दक्षिण भारत के कई राज्यों में केंद्र-राज्य जल संबंधों को लेकर तनाव पहले से बढ़ा हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें कर्नाटक को सहमति की अनिवार्यता से मुक्त बताया गया, कानूनी दृष्टि से विवादास्पद है — क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के संशोधित आदेश की व्याख्या पर विशेषज्ञों में भी मतभेद है। गौरतलब है कि कावेरी विवाद छह दशक पुराना है और इस दौरान कोई भी केंद्र सरकार स्थायी समाधान देने में सफल नहीं रही। असली परीक्षा यह है कि क्या यह प्रस्ताव केवल संसदीय रिकॉर्ड में दर्ज होकर रह जाएगा, या केंद्र को मेकेदातु पर ठोस नीतिगत स्पष्टता देने के लिए बाध्य करेगा।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मणिकम टैगोर ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव क्यों दिया?
कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना और तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा के लिए 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया। उनका कहना है कि जलशक्ति मंत्रालय के हालिया संसदीय जवाब ने तमिलनाडु की चिंताओं को अनदेखा किया है।
मेकेदातु परियोजना क्या है और तमिलनाडु को इससे क्या आपत्ति है?
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक जलाशय-सह-बिजली परियोजना है। तमिलनाडु का आरोप है कि इससे उसे मिलने वाले निर्धारित जल हिस्से में कमी आएगी, जिससे कावेरी डेल्टा के किसानों और पेयजल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ेगा।
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का फैसला क्या कहता है?
कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुदुच्चेरी के बीच कावेरी जल का आवंटन निर्धारित किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में इस फैसले में संशोधन किया था। टैगोर की मांग है कि इस संशोधित आदेश का पूर्ण और निष्पक्ष पालन सुनिश्चित किया जाए।
केंद्र सरकार का इस मामले में क्या रुख है?
जलशक्ति राज्य मंत्री ने संसद में कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कर्नाटक को कावेरी पर निर्माण के लिए निचले प्रवाह वाले राज्यों की सहमति लेना अनिवार्य नहीं बताया गया है। इसी जवाब को टैगोर ने 'चिंताजनक और निराशाजनक' बताते हुए प्रस्ताव का आधार बनाया।
टैगोर ने केंद्र सरकार से कौन-सी चार मांगें रखी हैं?
टैगोर ने मांग की है कि केंद्र तत्काल स्पष्ट करे कि वह तमिलनाडु के हितों की रक्षा कैसे करेगा; मेकेदातु सहित किसी भी ऐसी परियोजना को मंजूरी न दे जो निर्धारित जल हिस्से को प्रभावित करे; तमिलनाडु की आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करे; और एक निष्पक्ष संवैधानिक संस्था की भूमिका निभाते हुए सभी राज्यों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करे।
राष्ट्र प्रेस
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