तमिलनाडु: छात्रों को राजनीतिक प्रदर्शनों से रोकने वाला विवादित सर्कुलर वापस, संवैधानिक अधिकारों पर उठे थे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के कॉलेजिएट शिक्षा निदेशालय ने 19 अगस्त 2026 को वह विवादित सर्कुलर वापस ले लिया, जिसमें सरकारी कॉलेजों के प्राचार्यों को निर्देश दिया गया था कि वे छात्रों को वामपंथी दलों और करप्पनपूची जनता पार्टी द्वारा आयोजित प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकें। राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और सोशल मीडिया पर व्यापक विरोध के बाद सरकार को यह कदम उठाना पड़ा।
सर्कुलर की पृष्ठभूमि
यह सर्कुलर उस समय जारी किया गया था जब चेन्नई में वामपंथी दलों ने एक प्रदर्शन आयोजित किया था। यह प्रदर्शन नई दिल्ली में करप्पनपूची जनता पार्टी द्वारा नीट (राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा) के प्रश्नपत्रों में कथित अनियमितताओं और लीक के विरुद्ध चल रहे आंदोलन के समर्थन में था। इस प्रदर्शन में कई छात्र संगठनों ने भी भागीदारी की थी।
इसी पृष्ठभूमि में निदेशालय ने सरकारी कॉलेजों के प्राचार्यों को निर्देश दिया कि वे छात्रों को इन दलों के प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ।
विवाद और आलोचना
सर्कुलर के सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित होते ही विरोध की लहर उठ गई। आलोचकों का कहना था कि शांतिपूर्ण और कानूनी राजनीतिक गतिविधियों में छात्रों की भागीदारी पर इस तरह की व्यापक रोक उनके लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
करप्पनपूची जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरव दास ने इस निर्देश को 'असंवैधानिक' करार देते हुए तमिलागा वेत्रि कझगम सरकार पर अनुचित और मनमाना फैसला लेने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थान अकादमिक अनुशासन बनाए रख सकते हैं, लेकिन छात्रों की वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति को दबाने का अधिकार उन्हें नहीं है।
सरकार की प्रतिक्रिया
बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने सर्कुलर वापस ले लिया। हालाँकि, अधिकारियों की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह निर्देश किन परिस्थितियों में जारी हुआ और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई होगी या नहीं।
व्यापक संदर्भ
यह घटनाक्रम डिंडीगुल जिले में एक अधिकारी द्वारा कथित तौर पर गुजिलियामपरई तालुक के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में वामपंथी दलों के सदस्यों की जानकारी जुटाने का निर्देश दिए जाने के एक दिन बाद सामने आया। उस अधिकारी का बाद में तबादला कर दिया गया था। इन दोनों घटनाओं ने राज्य में कथित तौर पर वैध राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गौरतलब है कि वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्र प्रायः शिक्षा से संबंधित मुद्दों के साथ-साथ व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर होने वाले प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब किसी राज्य सरकार के किसी निर्देश ने छात्रों के राजनीतिक अधिकारों को लेकर बहस छेड़ी हो।
आगे क्या
सर्कुलर वापस लिए जाने के बाद भी विपक्षी दलों और छात्र संगठनों ने माँग की है कि सरकार स्पष्ट करे कि ऐसे निर्देश भविष्य में जारी नहीं होंगे। जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर दबाव बना हुआ है।