निर्वासित तिब्बती सरकार का चीन के 'जातीय एकता कानून' के खिलाफ धर्मशाला में शांति मार्च, आजादी की मांग दोहराई
सारांश
मुख्य बातें
धर्मशाला में 20 अगस्त 2026 को तिब्बती शहीद लोबसांग पाल्डेन (लोबगा रंगज़ेन) के बलिदान के 49वें दिन निर्वासित तिब्बती सरकार — सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) — और निर्वासित तिब्बती संसद ने संयुक्त रूप से प्रार्थना सभा और शांति मार्च आयोजित किया। मैक्लोडगंज स्थित त्सुगलाखंग मंदिर से शुरू होकर धर्मशाला पुलिस मैदान तक निकाले गए इस मार्च में बड़ी संख्या में तिब्बती समुदाय के सदस्य, निर्वासित सरकार के प्रतिनिधि और तिब्बत समर्थक शामिल हुए। यह आयोजन चीन के हाल ही में लागू किए गए 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाले कानून' के विरोध में भी था।
मुख्य घटनाक्रम
कार्यक्रम की शुरुआत त्सुगलाखंग मंदिर में दो घंटे की प्रार्थना सभा से हुई, जहाँ तिब्बत के भीतर और बाहर शहीद हुए सभी तिब्बती देशभक्तों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई और उनके परिजनों के प्रति एकजुटता व्यक्त की गई। तिब्बती बौद्ध परंपरा में मृत्यु के बाद की 49 दिवसीय मध्यवर्ती अवस्था — जिसे 'बारदो' कहते हैं — के पूर्ण होने के अवसर पर यह दिन विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
प्रार्थना सभा के बाद शांति मार्च मैक्लोडगंज से धर्मशाला पुलिस मैदान तक निकाला गया। CTA ने दुनिया भर के सभी तिब्बती सेटलमेंट कार्यालयों और तिब्बत कार्यालयों को निर्देश जारी किए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इसी तरह की प्रार्थना सभाएँ आयोजित करें।
सिक्योंग की प्रतिक्रिया
निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री (सिक्योंग) पेम्पा त्सेरिंग ने कहा कि यह मार्च केवल लोबसांग पाल्डेन के बलिदान को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि चीन की उन नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध भी है, जिनका उद्देश्य तिब्बतियों की अलग सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान को समाप्त करना है।
उन्होंने आरोप लगाया कि चीन का नया कानून नाम से भले ही एकता और प्रगति की बात करता हो, परंतु व्यवहार में इसका उद्देश्य तिब्बतियों, उइगरों, मंगोलों और अन्य मान्यता प्राप्त जातीय अल्पसंख्यक समुदायों का 'चीनीकरण' (सिनिसाइजेशन) करना है। त्सेरिंग ने कहा कि चीन अलग-अलग समुदायों की भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान को समाप्त कर उन्हें एकरूप चीनी पहचान में समाहित करने की कोशिश कर रहा है।
सिक्योंग ने स्पष्ट किया कि CTA आत्मदाह को आंदोलन का रास्ता नहीं मानता। उन्होंने कहा कि एक भी तिब्बती देशभक्त की जान जाना पूरे तिब्बती आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है और यह मार्च लोगों से शांतिपूर्ण संघर्ष तथा अंतरराष्ट्रीय समर्थन को मजबूत करने की अपील करता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
पेम्पा त्सेरिंग के अनुसार, चीन के नए कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों ने इस कानून की आलोचना की है या चिंता जताई है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में इस कानून पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे अल्पसंख्यक भाषाओं में शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। यूरोपीय संसद ने भी इस कानून की निंदा करते हुए इसे वापस लेने की माँग की है।
व्यापक एकजुटता का संदेश
त्सेरिंग ने बताया कि जुलाई 2026 की शुरुआत से दुनिया के कई देशों में तिब्बती समुदाय ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अभियान और जनजागरण कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन कार्यक्रमों में उइगर, मंगोलियाई और लोकतंत्र समर्थक चीनी समुदायों के लोग भी शामिल हुए हैं।
गौरतलब है कि यह आंदोलन केवल तिब्बती पहचान तक सीमित नहीं रहा — चीन की बढ़ती 'एसीमिलेशनिस्ट' नीतियों को लेकर कई अल्पसंख्यक समुदाय समान चिंताएँ साझा करते हुए एकजुट हो रहे हैं। सिक्योंग ने दुनिया भर के तिब्बत समर्थकों से अपील की कि वे तिब्बती लोगों के अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहें।
आगे की राह
निर्वासित तिब्बती सरकार का यह अभियान वैश्विक स्तर पर जारी रहने की उम्मीद है, क्योंकि CTA ने अपने सभी अंतरराष्ट्रीय कार्यालयों को एकजुट प्रार्थना सभाएँ आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। यह ऐसे समय में आया है जब चीन के अल्पसंख्यक नीति कानून को लेकर संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी सरकारों की आलोचना तेज हो रही है — और तिब्बती आंदोलन इस अंतरराष्ट्रीय दबाव को अपनी मुक्ति की माँग से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।