रबी सम्मेलन 2026: तिलहन-दलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर, ICAR प्रमुख मांगी लाल जाट ने गिनाई प्राथमिकताएँ
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक मांगी लाल जाट ने 29 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित रबी कृषि सम्मेलन के बाद पत्रकारों को बताया कि इस दो-दिवसीय सम्मेलन का केंद्रीय उद्देश्य राज्यों के साथ मिलकर एक ऐसी कार्ययोजना तैयार करना था, जिससे किसानों को आगामी रबी सीजन में समय पर बीज, फसल और उर्वरक संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें। सम्मेलन में तिलहन, दलहन और उर्वरक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के साथ-साथ टिकाऊ कृषि, डिजिटल खेती और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों पर विस्तृत विमर्श हुआ।
सम्मेलन की मुख्य प्राथमिकताएँ
सम्मेलन में सभी राज्यों के कृषि अधिकारियों और मंत्रियों ने भाग लिया। जाट ने बताया कि प्रत्येक राज्य की भौगोलिक और कृषि संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह मंथन किया गया कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल और कौन-सी किस्म किसानों के लिए सबसे उपयुक्त रहेगी। उन्होंने विशेष जोर दिया कि कोई भी किसान सरकारी योजनाओं और कृषि सुविधाओं से वंचित न रहे।
तिलहन और दलहन उत्पादन को बढ़ाना इस सम्मेलन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक रहा। राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कार्ययोजना तैयार करें और उसका तत्काल क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। यह ऐसे समय में आया है जब भारत खाद्य तेल और दालों के आयात पर भारी निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयासरत है।
उर्वरक उपलब्धता और संतुलित उपयोग पर जोर
मांगी लाल जाट ने बताया कि किसानों की प्रमुख चिंताओं में उर्वरकों की समय पर उपलब्धता शामिल है। इसके लिए न केवल पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने, बल्कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर भी विशेष बल दिया गया। उन्होंने बताया कि जिला स्तर पर उर्वरक उपयोग की सिफारिशों को संशोधित किया गया है और किसानों को इन्हीं संशोधित सिफारिशों के आधार पर उर्वरक उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
जाट के अनुसार, इस कदम से किसानों की उत्पादन लागत में कमी आएगी, मिट्टी की सेहत बनी रहेगी और देश के संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
पश्चिम एशिया संकट और उर्वरक सब्सिडी का बोझ
जाट ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी हालिया संकट के कारण उर्वरक सब्सिडी का बोझ सरकार पर पहले से अधिक बढ़ा है। ऐसे में उर्वरकों के विवेकपूर्ण और आवश्यकतानुसार उपयोग की ज़रूरत और अधिक बढ़ गई है। उनके अनुसार, अनावश्यक उर्वरक उपयोग में कमी आने से सरकारी व्यय घटेगा, भूमि स्वास्थ्य सुधरेगा और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव भी नहीं पड़ेगा।
गौरतलब है कि भारत उर्वरकों के लिए आयात पर काफी हद तक निर्भर है और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल इसकी कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला दोनों को सीधे प्रभावित करती है।
पंजाब ने उठाई डीएपी आपूर्ति की माँग
पंजाब के प्रतिनिधि ने सम्मेलन में राज्य के कृषि योगदान का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार से माँग की कि किसानों की ज़रूरतों, विशेष रूप से डीएपी (DAP) जैसे उर्वरकों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए समय पर आवश्यक धनराशि जारी की जाए। यह माँग इस बात का संकेत देती है कि उर्वरक वितरण में केंद्र-राज्य समन्वय अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है।
आगे की राह
सम्मेलन के निष्कर्षों के आधार पर राज्यों को अपनी-अपनी रबी कार्ययोजनाएँ शीघ्र अंतिम रूप देने का निर्देश दिया गया है। ICAR और कृषि मंत्रालय मिलकर राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन की निगरानी करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि तिलहन और दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए न केवल बेहतर बीज और उर्वरक आपूर्ति, बल्कि जलवायु अनुकूल खेती के व्यापक प्रसार की भी आवश्यकता होगी।