झारखंड में ICAR का 'खेत बचाओ अभियान': 5 जिलों के 5,000 किसानों को मिलेंगे उन्नत बीज और नैनो उर्वरक
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को रांची में भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर-आईआईएबी) के 'खेत बचाओ अभियान' कार्यक्रम में किसानों से सीधा संवाद किया। इस अभियान के तहत झारखंड के 5 जिलों में 5,000 से अधिक किसानों को वैज्ञानिक और टिकाऊ खेती से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
अभियान की मुख्य विशेषताएं
अनुसूचित जाति उपयोजना (SCSP) और जनजातीय उपयोजना (TSP) के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में 450 से अधिक किसान और महिला किसान शामिल हुए। वर्ष 2026 के खरीफ और रबी सीजन में किसानों को बैटरी-चालित स्प्रेयर, सब्जियों के बीज किट, सरसों की उन्नत किस्मों के बीज, मटर और गेहूं के बीज, तथा नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी वितरित किए गए हैं।
आईसीएआर-आईआईएबी के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित ने बताया कि अभियान का उद्देश्य फसल उत्पादकता बढ़ाना, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना और धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली ज़मीन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
मंत्री का संदेश: रासायनिक उर्वरकों से मुक्ति ज़रूरी
मंत्री रामनाथ ठाकुर ने मिट्टी की बिगड़ती सेहत पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि पिछले कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से कृषि भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है। उन्होंने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक खाद और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपील की।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार किसानों के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है, लेकिन जागरूकता और पहुंच की कमी के कारण बड़ी संख्या में किसान इनका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे। उन्होंने आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य सरकार की एजेंसियों से गांवों तक पहुंच बढ़ाने और किसानों को नई कृषि तकनीकों की जानकारी देने का आग्रह किया।
संयुक्त सचिव का ज़ोर: मृदा स्वास्थ्य कार्ड और जैविक मिशन
कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में शामिल कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव फ्रैंकलिन एल. खोबुंग ने किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित करने पर बल दिया। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के व्यापक प्रचार और मिट्टी की नियमित जांच की आवश्यकता रेखांकित की।
खोबुंग ने झारखंड में जैविक एवं प्राकृतिक खेती मिशन के तहत किसानों को मिलने वाली वित्तीय सहायता के बारे में भी जानकारी दी। गौरतलब है कि झारखंड के आदिवासी और अनुसूचित जाति बहुल ज़िलों में परंपरागत खेती और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता की दोहरी चुनौती मौजूद है, और यह अभियान उसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
किसान-वैज्ञानिक संवाद: क्या रही चर्चा
कार्यक्रम में किसान-वैज्ञानिक संवाद के दौरान रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग, जैविक खाद और गोबर की खाद को बढ़ावा देने, तथा पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में साइलेज के उपयोग पर विस्तार से चर्चा हुई। किसानों को नियमित मिट्टी जांच अपनाने और जैविक व प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय स्तर पर मृदा क्षरण एक बड़ी चिंता के रूप में उभर रहा है और केंद्र सरकार 'प्राकृतिक खेती' को नीतिगत प्राथमिकता दे रही है। झारखंड के किसानों के लिए यह अभियान एक व्यावहारिक पहल के रूप में उम्मीद जगाता है, बशर्ते इसकी पहुंच सुनिश्चित हो सके।